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राजस्थान के प्रमुख लोक देवता (Folk Deities of Rajasthan)

September 10, 2026 Sonu 1 min read

1. ‘पंचपीर’ की दार्शनिक व सांस्कृतिक अवधारणा

  • अवधारणा: राजस्थान के वे लोक देवता जिनकी आराधना हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय समान श्रद्धा से करते हैं, उन्हें ‘पीर’ कहा जाता है।
  • पंचपीर: पाबूजी राठौड़, हड़बूजी सांखला, रामदेवजी तंवर, मेहाजी मांगलिया और गोगाजी चौहान (स्मरण सूत्र: ‘हमारा गोपा’)।
  • परीक्षा चेतावनी: वीर तेजाजी और भगवान देवनारायणजी ‘महावीर’ श्रेणी के लोक देवता हैं; वे पंचपीर में सम्मिलित नहीं हैं।

2. पंचपीरों का विस्तृत एवं सूक्ष्म विश्लेषण

(A) बाबा रामदेवजी तंवर (सांप्रदायिक सद्भाव एवं समाज-सुधार के प्रतीक)

  • जन्म एवं वंश: भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (‘बाबेरी बीज’) को उंडूकाश्मीर (शिव तहसील, बाड़मेर) में तंवर वंशीय राजपूत परिवार में जन्म।
    • माता-पिता: अजमाल जी (पिता) एवं मैणादे (माता)।
    • पत्नी: नेतलदे (अमरकोट के सोढ़ा दलपत सिंह की पुत्री)।
    • अवतार: भगवान श्रीकृष्ण / विष्णु का अवतार; अर्जुन के वंशज।
  • गुरु एवं दीक्षा: मसूरिया पहाड़ी (जोधपुर) के योगी बालीनाथ जी।
  • सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं सामाजिक सुधार:
    • राजस्थान के एकमात्र लोक देवता जो संत होने के साथ-साथ उच्च कोटि के कवि भी थे
    • ग्रंथ: ’24 वाणियां’
    • कामड़िया पंथ: अछूतोद्धार और सामाजिक समरसता हेतु इसकी स्थापना की।
    • धर्म-बहन: डाली बाई (मेघवाल जाति), जिन्होंने रामदेवजी से एक दिन पूर्व जल-समाधि ली थी।
  • पारिभाषिक सांस्कृतिक शब्दावली:
    • पगल्ये: इनके थानों (पूजा स्थलों) पर पद-चिह्नों (पगल्ये) की पूजा की जाती है।
    • रिखिया: मेघवाल जाति के अनन्य भक्त।
    • जम्मा (जमा): रात्रि जागरण।
    • नेजा: पांच रंगों की ध्वजा।
    • ब्यावले: इनके भक्तों द्वारा गाए जाने वाले भजन।
  • मेला एवं लोक नृत्य (कलात्मक आयाम):
    • समाधि स्थल: रुणीचा (रामदेवरा, पोकरण, जैसलमेर) में भाद्रपद शुक्ल एकादशी (1458 ई.) को जीवित समाधि ली।
    • मेला: भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक आयोजित, जिसे ‘मारवाड़ का कुंभ’ कहा जाता है।
    • तेरहताली नृत्य: कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा बैठकर 13 मंजीरों की सहायता से किया जाने वाला चमत्कारिक व्यावसायिक लोक नृत्य, जो इस मेले का प्रधान आकर्षण है।

(B) पाबूजी राठौड़ (गौ-रक्षक, ऊंटों के देवता एवं प्लेग रक्षक)

  • जन्म एवं वंश: 1239 ईस्वी (चैत्र अमावस्या) को कोलू मंड (फलोदी) में राठौड़ वंश में जन्म।
    • माता-पिता: धांधल जी राठौड़ एवं कमलादे।
    • पत्नी: सुप्यारदे / फूलमदे (अमरकोट के सूरजमल सोढ़ा की पुत्री)।
  • वाहन एवं प्रतीक-विधान:
    • घोड़ी: देवल चारणी द्वारा दी गई ‘केसर कालमी’
    • प्रतीक: बाईं ओर झुकी हुई पाग (पगड़ी) तथा हाथ में भाला लिए अश्वारोही प्रतिमा।
  • सांस्कृतिक योगदान एवं आस्था:
    • मारवाड़ में सर्वप्रथम सांडे (ऊंट) लाने का श्रेय पाबूजी को जाता है। ऊंट के बीमार होने पर पाबूजी की मनौती मानी जाती है।
    • आराध्य जातियाँ: ऊंट पालक रेबारी (राइका) जाति तथा नायक/थोरी समाज।
    • गौ-रक्षा बलिदान: देवल चारणी की गायों को जायल (नागौर) के जींदराव खींची से छुड़ाते हुए देचू (फलोदी) गाँव में वीरगति को प्राप्त हुए।
  • कला, वाद्य यंत्र एवं साहित्य:
    • फड़ वाचन: राजस्थान की सर्वाधिक लोकप्रिय फड़ पाबूजी की है, जिसे नायक/भील भोपों द्वारा ‘रावणहत्था’ (तत वाद्य) के साथ बांचा जाता है।
    • पवाड़े: पाबूजी के वीरगाथा पवाड़े ‘माठ’ (अवनद्ध वाद्य) के साथ थोरी जाति द्वारा गाए जाते हैं।
    • थाली नृत्य: पाबूजी के भक्तों द्वारा कोलू मंड मेले में किया जाने वाला लोक नृत्य।
    • साहित्यिक ग्रंथ: ‘पाबू प्रकाश’ (आशिया मोड़जी कृत)।

(C) गोगाजी चौहान (जाहर पीर, नागराज एवं गौ-रक्षक)

  • जन्म एवं पृष्ठभूमि: भाद्रपद कृष्ण नवमी (गोगा नवमी), 946 ईस्वी (वि.सं. 1003) को ददरेवा (चूरू) में जन्म।
    • माता-पिता: जेवर सिंह चौहान एवं बाछल देवी।
    • पत्नी: केलमदे (कमलदे – पाबूजी के भाई बुड़ोजी की पुत्री)।
    • गुरु: गोरखनाथ (नाथ संप्रदाय)।
  • उपाधियाँ एवं वाहन:
    • जाहर पीर (साक्षात पीर): रण-कौशल देखकर महमूद गजनवी द्वारा प्रदत्त उपाधि।
    • सवारी: नीली घोड़ी (गोगा बप्पा/बाप्पा); कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार घोड़े का नाम जवाड़िया था।
    • ध्वजा: पवित्र निशान।
  • तीर्थ एवं स्थापत्य (Architecture):
    • शीर्षमेड़ी (शीशमेड़ी): ददरेवा (चूरू), जहाँ युद्ध में इनका सिर गिरा।
    • धुरमेड़ी (गोगामेड़ी): नोहर (हनुमानगढ़), जहाँ इनका धड़ गिरा और समाधि स्थित है।
      • स्थापत्य: इसका निर्माण मकबरेनुमा आकृति में फिरोजशाह तुगलक ने करवाया; मुख्य द्वार पर ‘बिस्मिल्लाह’ अंकित है।
      • आधुनिक स्वरूप: बीकानेर महाराजा गंगा सिंह द्वारा प्रदान किया गया।
      • पूजा पद्धति: वर्ष के 11 माह कायमखानी मुस्लिम पुजारी (चायल) तथा 1 माह (भाद्रपद) हिंदू पुजारी सेवा करते हैं।
    • गोगाजी की ओल्डी: किलोरियों की ढाणी, सांचौर (जालौर) में राजाराम कुम्हार द्वारा निर्मित।
  • सांस्कृतिक परंपरा एवं साहित्य:
    • गोगा राखड़ी: वर्षा के बाद हल जोतते समय हल और हाली को 9 गांठों वाली गोगा राखड़ी बांधी जाती है।
    • लोक नृत्य: डेरू व मंजीरा वाद्य के साथ शेखावाटी में सांकल नृत्य व गोगा नृत्य।
    • ग्रंथ: ‘गोगाजीरा रसावला’ (कवि मेहा), ‘कायम खां रासो’ (जान कवि)।

(D) हड़बूजी सांखला (शकुन शास्त्र के ज्ञाता)

  • जन्म व समकालीन संदर्भ: बुंडेल (नागौर) में जन्म; सांखला राजपूत। रामदेवजी के मौसेरे भाई तथा गुरु बालीनाथ के शिष्य। मारवाड़ के राव जोधा के समकालीन।
  • वाहन एवं विशिष्ट पूजा परंपरा:
    • वाहन: सियार।
    • विशेषता: शकुन शास्त्र के अद्वितीय ज्ञाता तथा सिद्ध पुरुष।
    • मंदिर: बैंगटी (फलोदी) में महाराजा अजीतसिंह द्वारा निर्मित।
    • पूजा: मंदिर में किसी मूर्ति के स्थान पर हड़बूजी की छकड़ा गाड़ी (बैलगाड़ी) की पूजा की जाती है, जिससे वे पंगु, असहाय और बीमार गायों के लिए चारा लाते थे।

(E) मेहाजी मांगलिया (मांगलिया समाज के इष्टदेव)

  • जन्म एवं वाहन: 13वीं शताब्दी में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी) को पवार/मांगलिया राजपूत कुल में जन्म।
    • अश्व: ‘किरण काबरा’
  • मंदिर एवं मेला: मुख्य मंदिर बापिणी (जोधपुर) में स्थित है, जहाँ भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी) को मेला भरता है।
  • विशिष्ट सांस्कृतिक तथ्य: मेहाजी के पुजारियों (भोपों) के वंश में वृद्धि नहीं होती; वे गोद लेकर अपनी वंश-परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।

3. राजस्थान के प्रमुख ‘महावीर’ लोक देवता

(A) वीर तेजाजी महाराज (कृषि कार्यों के उपकारक व गौ-मुक्तिदाता)

  • जन्म एवं पृष्ठभूमि: माघ शुक्ल चतुर्दशी, 1073 ईस्वी को खड़नाल (नागौर) के जाट (धोलिया गोत्र) परिवार में जन्म।
    • माता-पिता: ताहड़ जी एवं रामकुंवरी।
    • पत्नी: पेमल (पनेर, अजमेर के रायमल झांझर की पुत्री)।
    • बहनें: राज और भोंगरी (बूंगरी माता मंदिर, खड़नाल)।
  • अवतार एवं उपाधियाँ:
    • भगवान शिव के अवतार; काला और बाला के देवता, कृषि कार्यों के उपकारक देवता, गायों के मुक्तिदाता, धोलियावीर।
    • आराध्य देव: जाट समाज तथा सहरिया जनजाति के आराध्य लोक देवता। अजमेर जिले के सबसे प्रमुख लोक देवता।
  • प्रतीक-विधान, वाहन एवं चिकित्सा पद्धति:
    • वाहन: घोड़ी लीलन (उपनाम: श्रृंगारी)।
    • प्रतीक: हाथ में तलवार लिए अश्वारोही योद्धा, जिनकी बाहर निकली जिह्वा को नाग डस रहा है।
    • घोड़ला: तेजाजी के थान के पुजारी को घोड़ला (भोपा) कहते हैं। सामान्यतः कुम्हार जाति, किंतु पनेर मंदिर में माली जाति के पुजारी होते हैं।
    • तांती: सर्पदंश से रक्षा हेतु दाएँ पैर में 9 गांठों वाली तांती बांधी जाती है।
    • तेजा टेर: किसान खेतों में अच्छी फसल व सुरक्षा की कामना से बुवाई के समय तेजा गीत (तेजा टेर) गाते हैं।
  • प्रमुख तीर्थ स्थल:
    • सेंद्रिया (ब्यावर): सर्प ने जिह्वा पर डसा।
    • सुरसुरा (किशनगढ़, अजमेर): लाछा गूँजरी की गायों की रक्षा करते हुए भाद्रपद शुक्ल दशमी (1103 ई.) को देवलोकगमन। नवीन थानों के लिए ‘जागती जोत’ यहीं से जाती है।
    • बांसी दुगारी (बूंदी): तेजाजी की प्रमुख कर्मस्थली।
    • पर्वतसर (डीडवाना-कुचामन): भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी) को ‘श्री वीर तेजाजी पशु मेला’ आयोजित होता है, जो नागोरी बैलों के व्यापार के लिए विख्यात है।

(B) भगवान देवनारायणजी (आयुर्वेद के ज्ञाता एवं राज्य क्रांति के जनक)

  • जन्म एवं पृष्ठभूमि: गोटा दड़ावत (आसिंद, भीलवाड़ा) में खारी नदी के किनारे बगड़ावत कुल के प्रमुख सवाई भोज एवं माता साडू खटाणी (गुर्जर) के घर जन्म। बचपन का नाम उदल (उदयसिंह)
    • पत्नी: पीपलदे (धार, मध्य प्रदेश के राजा जयसिंह देव परमार की पुत्री, जिनका कुष्ठ रोग इन्होंने ठीक किया था)।
    • सवारी: लीलाधर घोड़ा
  • अवतार एवं दार्शनिक स्वरूप:
    • भगवान विष्णु के अवतार; गुर्जर समाज के आराध्य देव, आयुर्वेद के ज्ञाता, औषधि विज्ञान के देवता, कमल अवतरित देवता, ‘ईंटों का श्याम’।
  • प्रतीक एवं अनुष्ठान:
    • इनके मंदिरों (देवरा) में मूर्ति नहीं होती, बल्कि ईंटों की पूजा की जाती है।
    • ईंटों पर नीम की पत्तियां चढ़ाई जाती हैं तथा छाछ-राबड़ी का भोग लगता है।
  • प्रमुख तीर्थ:
    • सवाई भोज मंदिर (आसिंद, भीलवाड़ा): जन्म स्थली।
    • देवमाली (ब्यावर): समाधि स्थल (जहाँ देह त्यागी)।
    • देवधाम जोधपुरिया (निवाई, टोंक): बांडी-मासी संगम के निकट (भित्ति चित्रों हेतु प्रसिद्ध)।
    • देव डूंगरी (चित्तौड़गढ़): राणा सांगा द्वारा निर्मित।
  • फड़ चित्रकला एवं जंतर वाद्य (Technical Nuances):
    • राजस्थान की सबसे प्राचीन, सर्वाधिक चित्रों वाली सबसे लंबी और डाक टिकट जारी होने से सबसे छोटी फड़
    • वाचन: केवल गुर्जर भोपों द्वारा ‘जंतर’ (तत वाद्य) के साथ खड़े होकर किया जाता है।
    • जंतर वाद्य: वीणा का प्रारंभिक रूप; इसमें दो तुम्बे होते हैं और मगरमच्छ की खाल के 22 पर्दे मोम से चिपकाए जाते हैं।

(C) अन्य प्रमुख लोक देवता

  • मल्लीनाथ जी राठौड़:
    • मारवाड़ के लोक देवता; राजधानी मेवा नगर (बाड़मेर)।
    • गुरु: उगमसी भाटी। पत्नी रानी रूपादे के प्रभाव से 1389 ई. में निर्गुण भक्ति अपनाई।
    • 1399 ई. में मारवाड़ के संतों का विशाल ‘हरिकीर्तन’ आयोजित करवाया।
    • मेला: तिलवाड़ा (बालोतरा) में लूणी नदी तट पर चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक ‘मल्लीनाथ पशु मेला’ (थारपारकर व कांकरेज नस्ल हेतु विख्यात)।
  • तल्लीनाथ जी (गांगदेव राठौड़):
    • शेरगढ़ (जोधपुर) ठिकाने के शासक; गुरु जालंधर नाथ।
    • जालौर क्षेत्र के प्रमुख लोक देवता। पंचमुखी पहाड़ी (पांचोटा, जालौर) पर मंदिर।
    • राजस्थान में ‘ओरण’ (पेड़-पौधे काटने पर प्रतिबंध वाला पवित्र वन क्षेत्र) के संरक्षणकर्ता देवता।

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