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प्राचीन भारतीय कला एवं स्थापत्य: मौर्य स्तंभ, स्तूप निर्माण, गुफाएं एवं मंदिर वास्तुकला

September 14, 2026 Sonu 1 min read

1. प्रस्तावना: प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला की पृष्ठभूमि

प्राचीन भारतीय कला एवं स्थापत्य केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं था, बल्कि यह तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और दार्शनिक परिस्थितियों की जीवंत अभिव्यक्ति था। कला शून्य से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि वह अपने समय के समाज और विचारों की उपज होती है

स्थापत्य के निर्माण को प्रेरित करने में विभिन्न कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही:

  • राजनीतिक कारक:
    • दूरवर्ती क्षेत्रों में अपनी प्रशासनिक पहुंच और संप्रभुता बनाए रखने के लिए शासकों ने स्थापत्य का सहारा लिया। उदाहरण के लिए, सम्राट अशोक ने अपने विशाल साम्राज्य के विभिन्न कोनों में शिलाओं और प्रस्तर स्तंभों पर अपने राजकीय आदेश खुदवाए।
    • स्थापत्य शासकों के राजकीय गौरव और सैन्य विजय को प्रदर्शित करने का माध्यम भी था। उदाहरण के लिए, चोल शासक राजराजा प्रथम द्वारा तंजौर के बृहदेश्वर मंदिर के शिखरों पर निर्मित स्तूपिका सामंतों पर उसकी विजय को रेखांकित करती है।
    • दूसरी सदी ईस्वी से विभिन्न राजवंशों ने अपने कुल-देवताओं (शिव, विष्णु, सूर्य) के सम्मान में भव्य मंदिरों का निर्माण कराना आरंभ किया।
  • आर्थिक कारक:स्थापत्य निर्माण में आर्थिक समृद्धि ने आधारशिला का कार्य किया। जिस काल में व्यापार और कृषि अधिशेष बढ़ा, उस काल में निर्माण कार्यों को विशेष प्रोत्साहन मिला। उदाहरण के लिए, मौर्योत्तर काल में संपन्न कुलीनों, व्यापारियों और श्रेणियों के सहयोग से बड़ी संख्या में चैत्य, स्तूप और विहार बने, जबकि गुप्त काल की आर्थिक संपन्नता ने मंदिर निर्माण को बढ़ावा दिया।
  • सामाजिक एवं धार्मिक कारक:विशिष्ट समुदायों ने अपनी पहचान सुरक्षित रखने अथवा पूर्वजों के सम्मान में स्मारकों का निर्माण कराया। धार्मिक स्तर पर बौद्ध पंथ ने स्तूप, चैत्य और विहारों के निर्माण को गति दी, जबकि ब्राह्मणवादी भक्ति के प्रसार ने विष्णु, शिव और दुर्गा के मंदिरों की आधारशिला रखी।
  • दार्शनिक कारक (ब्रह्मांडीय संरचना का प्रतीक):प्राचीन स्थापत्य के पीछे गहरा ब्रह्मांडीय दर्शन निहित था:
    • स्तूप का अंड भाग: यह ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित ‘मेरु पर्वत’ का प्रतीक माना जाता है।
    • अशोक के स्तंभ: यह आकाश और पृथ्वी के मध्य एक विभाजक अक्ष (Axis Mundi) के रूप में खड़े दिखते हैं।
    • मंदिर का गर्भगृह व शिखर: मंदिर का गर्भगृह ब्रह्मांड के केंद्र (मेरु पर्वत) का प्रतीक है। उसके ऊपर उठता हुआ शिखर पृथ्वी और आकाश के मिलन को विभाजित करता है। गर्भगृह के चारों ओर बना वृत्ताकार प्रदक्षिणा पथ संसार की निरंतर गतिशीलता का प्रतीक है, जबकि शिखर पर उकेरी गई यक्ष, यक्षिणी, अप्सरा और गंधर्वों की प्रतिमाएं अंतरिक्ष में विचरण करने वाले जीवों को दर्शाती हैं।

2. मौर्यकालीन कला: राजकीय कला एवं लोक कला का विभाजन

मौर्यकालीन कला भारतीय मूर्तिकला और स्थापत्य का पहला सुव्यवस्थित प्रस्तर युग माना जाता है। इसकी प्रमुख विशेषता यह थी कि यह मुख्य रूप से राजाश्रय में विकसित हुई और इस पर बौद्ध दर्शन का गहरा प्रभाव था

मौर्य कला को दो स्पष्ट श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

  1. राजकीय कला (Court Art)
  2. लोक कला (Popular Art)

A. मौर्यकालीन राजकीय कला

राजकीय कला का विकास मौर्य सम्राटों के सीधे संरक्षण में हुआ, जिसके मुख्य उदाहरण निम्नलिखित हैं:

  • 1. अशोक के एकाश्म प्रस्तर स्तंभ:अशोक के स्तंभ चुनार (उत्तर प्रदेश) के बलुआ पत्थर से तराश कर बनाए गए हैं। ये पूरी तरह एकाश्म (Monolithic – एक ही पत्थर से निर्मित) हैं।
    • स्तंभ की संरचना: स्तंभ के मुख्य रूप से दो भाग होते थे—नीचे का लंबा गोलाकार भाग ‘यष्टि’ (लाट) कहलाता था। यष्टि के शीर्ष पर एक उल्टे कमल (अवांगमुखी कमल) की आकृति होती थी, जिसके ऊपर एक समतल ‘चौकी’ (फलक) बनी होती थी। चौकी के ऊपर किसी पशु की प्रतिमा स्थापित की जाती थी।
    • चार प्रमुख पशु और बौद्ध प्रतीक: चौकी पर सामान्यतः चार पशु उकेरे जाते थे, जिनका संबंध बुद्ध के जीवन की घटनाओं से था:
      • हाथी: बुद्ध के माता के गर्भ में आने का प्रतीक।
      • सांड: बुद्ध के यौवन का प्रतीक (हड़प्पा सभ्यता में यह उत्पादन और उर्वरता का प्रतीक था)।
      • घोड़ा: बुद्ध के गृह-त्याग (महाभिनिष्क्रमण) का प्रतीक।
      • सिंह: आत्म-विजय और शांति का प्रतीक (आगे चलकर सिंह देवी दुर्गा के वाहन के रूप में जुड़ा और संहारक शक्ति का प्रतीक बना)। *सारनाथ के स्तंभ शीर्ष पर चार सिंह एक-दूसरे से पीठ सटाए बैठे हैं, जो चक्रवर्ती शासन और धर्म के चार दिशाओं में प्रसार का संदेश देते हैं। अशोक स्तंभों की सतह पर की गई विशेष शीशे जैसी चमकदार पॉलिश (मौर्य पॉलिश) इस कला की अद्वितीय तकनीकी उपलब्धि थी।
  • 2. स्तूप निर्माण (सांची का स्तूप):अशोक कालीन स्तूप वास्तुकला का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण मध्य प्रदेश का सांची का स्तूप है। आरंभिक रूप में यह कच्ची ईंटों से निर्मित एक साधारण अर्धवृत्ताकार संरचना थी, जिसे बाद के कालों में प्रस्तर वेष्टनी से घेरा गया।
  • 3. गुफा वास्तुकला (Cave Architecture):भारत में शैलकर्तित (Rock-cut) गुफाओं के निर्माण की औपचारिक शुरुआत मौर्य काल में हुई। गया (बिहार) के निकट बराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों को काटकर आजीवक संप्रदाय के संन्यासियों के लिए गुफाओं का निर्माण कराया गया।
    • संरचना: इन गुफाओं का प्रवेश द्वार आयताकार काटा जाता था और अंदर एक कमरा निर्मित होता था। गुफाओं की आंतरिक दीवारों और छतों पर कांच जैसी चमकदार काली पॉलिश की गई थी, जो आज भी सुरक्षित है।

B. मौर्यकालीन लोक कला

राजाश्रय से इतर सामान्य जनसमुदाय और स्थानीय मूर्तिकारों द्वारा लोक कला का विकास किया गया

  • यक्ष और यक्षिणी की प्रतिमाएं: लोक कला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण मथुरा, बेसनगर, पटना और दीदारगंज से प्राप्त यक्ष-यक्षिणी की विशाल प्रस्तर प्रतिमाएं हैं।
  • कलात्मक विशेषता: ये प्रतिमाएं खुले आकाश के नीचे स्थापित की जाती थीं। इन मूर्तियों का शारीरिक सौष्ठव (देह यष्टि) दर्शनीय है। मूर्तिकारों ने बड़े ही यथार्थवादी ढंग से मानवरूपी मांसल शरीर, आभूषण और वस्त्रों की बारीक सिलवटों को तराशा है।
  • पतन का कारण: चूंकि राजकीय कला पूरी तरह सम्राटों के संरक्षण पर निर्भर थी, इसलिए मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ ही स्तंभ निर्माण और शीशे जैसी पॉलिश की तकनीक लुप्त हो गई, परंतु लोक कला की परंपरा आगे भी जारी रही।

3. मौर्योत्तर कालीन स्थापत्य: व्यापक सामाजिक आधार एवं स्तूप वास्तुकला

मौर्योत्तर काल (200 ईसा पूर्व – 300 ईस्वी) में कला को एक व्यापक और लोकतांत्रिक सामाजिक आधार प्राप्त हुआ। अब कला केवल सम्राटों की इच्छा पर निर्भर नहीं थी, बल्कि इसे राजाओं (शुंग, सातवाहन, कुषाण) के अतिरिक्त व्यापारियों, नगरश्रेष्ठियों, बौद्ध भिक्षुओं, भिक्षुणियों और सामान्य शिल्पियों का भारी दान व संरक्षण मिला

इस काल की कला का मुख्य प्रेरणा स्रोत बौद्ध धर्म था, जिसके कारण मंदिरों के स्थान पर बड़ी संख्या में स्तूप, चैत्य एवं विहारों का निर्माण हुआ

स्तूप की विस्तृत वास्तुकला संरचना

स्तूप मूलतः बौद्ध उपासना और श्रद्धा का सर्वोच्च केंद्र था। स्तूप वास्तुकला के प्रमुख अंग निम्नलिखित थे:

  • अंड (Medhi & Semi-circular Dome): यह स्तूप का मुख्य आधार होता था, जो ईंटों या पत्थरों से बना एक ठोस अर्धवृत्ताकार गुंबद था। यह संसार और ब्रह्मांड का प्रतीक था।
  • हर्मिका (Harmika): अंड के सबसे ऊपरी समतल भाग पर बनी एक चौकोर चहारदीवारी या कटघरे जैसी संरचना को हर्मिका कहा जाता था। इसे बौद्ध परंपरा में देव-सदन (पवित्र स्थल) माना जाता था।
  • धातु मंजूषा (Relic Casket): हर्मिका के भीतर सोने, चांदी अथवा पाषाण के बने डिब्बे में तथागत बुद्ध अथवा उनके प्रमुख अर्हतों (संतों) के अस्थि अवशेष, केश, नख या उनके उपयोग की वस्तुएं रखी जाती थीं।
  • यष्टि एवं छत्र (Yasti and Chhatra): हर्मिका के ठीक केंद्र से एक सीधा पाषाण स्तंभ निकलता था, जिसे ‘यष्टि’ कहते थे। इस यष्टि पर तीन क्रमिक छतरियां (छत्रावली) लगी होती थीं, जो बौद्ध धर्म के त्रिरत्नों—बुद्ध, धम्म और संघ तथा श्रद्धा, सम्मान और पराक्रम की प्रतीक थीं।
  • प्रदक्षिणा पथ एवं वेदिका (Pradakshina Path & Vedika): स्तूप के चारों ओर श्रद्धालुओं के परिक्रमा करने के लिए दो प्रदक्षिणा पथ होते थे—एक भूतल पर और दूसरा अंड के ऊपर मेधि पर। स्तूप को सुरक्षित रखने के लिए चारों ओर से पत्थर के सुंदर कटघरे (वेदिका/रेलिंग) से घेरा जाता था।
  • तोरण द्वार (Torana Gates): शुंग और सातवाहन काल में सांची और भरहुत स्तूप में चारों दिशाओं में भव्य अलंकृत ‘तोरण द्वार’ जोड़े गए। इन द्वारों पर जातक कथाओं, बुद्ध के जीवन की घटनाओं, यक्ष-यक्षिणियों, लता-वल्लरी और पशु-पक्षियों की अत्यंत सजीव नक्काशी की गई थी।

स्तूप पर लोक परंपरा का प्रभाव: स्तूप निर्माण की मूल प्रेरणा जनजातीय परंपरा से ली गई थी। प्राचीन काल में किसी कबीलाई सरदार या मुखिया की मृत्यु के पश्चात उसकी समाधि पर मिट्टी का टीला बना दिया जाता था। बौद्ध धर्म ने इस लोक परंपरा को ग्रहण कर उसे दार्शनिक और स्थापत्य का भव्य स्वरूप प्रदान किया

4. प्राचीन गुफा वास्तुकला: चैत्य एवं विहार

मौर्योत्तर काल और गुप्त काल में पश्चिमी भारत (महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट—कार्ले, भाजा, कन्हेरी, अजंता और एलोरा) में बेसाल्ट चट्टानों को काटकर गुफा वास्तुकला को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया गया। ये गुफाएं मुख्य रूप से दो प्रकार की थीं:

  • 1. चैत्य (बौद्ध प्रार्थना गृह):चैत्य बौद्ध भिक्षुओं का सामूहिक पूजा गृह होता था।
    • इसकी बनावट घोड़े की नाल के आकार (Gopuram/Vaulted Roof) की होती थी।
    • इसके दोनों ओर स्तंभों की कतारें होती थीं, जो हॉल को तीन भागों में बांटती थीं।
    • चैत्य के सुदूर अंतिम अर्धवृत्ताकार भाग में पूजा के लिए एक ठोस पाषाण स्तूप उत्कीर्ण होता था।
    • महाराष्ट्र का कार्ले चैत्य अपनी भव्यता, विशाल स्तंभों और प्रकाश व्यवस्था के लिए प्राचीन भारत का सबसे उत्कृष्ट चैत्य माना जाता है।
  • 2. विहार (बौद्ध भिक्षुओं का निवास गृह):वर्षा ऋतु में बौद्ध भिक्षुओं के ठहरने (वर्षावास) के लिए विहारों का निर्माण किया जाता था। इसमें एक केंद्रीय चौकोर आंगन या हॉल होता था, जिसके चारों तरफ छोटे-छोटे आवासीय कक्ष (कोठरियां) बने होते थे। भिक्षुओं के सोने के लिए पत्थर के तख्ते बनाए जाते थे।

5. गुप्त एवं पूर्व-मध्यकालीन मंदिर वास्तुकला का विकास

गुप्त काल से पूर्व भारत में देवी-देवताओं की पूजा खुले चबूतरों या काष्ठ संरचनाओं में होती थी। गुप्त काल में पहली बार स्थायी ईंटों और पत्थरों के स्वतंत्र मंदिरों का निर्माण प्रारंभ हुआ

  • गुप्तकालीन मंदिर निर्माण के चरण:
    • प्रारंभिक चरण में मंदिर अत्यंत सादे थे, जिनकी छतें सपाट होती थीं और एक छोटा गर्भगृह तथा प्रवेश द्वार पर छोटा मंडप होता था।
    • आगे चलकर ऊंचे चबूतरे बनाए जाने लगे और गर्भगृह के चारों ओर ढका हुआ प्रदक्षिणा पथ विकसित हुआ।
    • गुप्त काल के अंतिम चरण में शिखर निर्माण की शुरुआत हुई। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण झांसी (उत्तर प्रदेश) के देवगढ़ का दशावतार मंदिर है, जिसमें भगवान विष्णु को शेषनाग की शैय्या पर विश्राम करते हुए (अनंतशायी विष्णु) दर्शाया गया है। कानपुर का भीतरगांव मंदिर पूरी तरह पकी हुई ईंटों से बना गुप्तकालीन मंदिर है।
  • पूर्व-मध्य काल में मंदिर शैलियों का विभाजन:750 ईस्वी के बाद भारत में मंदिर निर्माण की तीन स्पष्ट क्षेत्रीय शैलियां विकसित हुईं:
    1. नागर शैली (उत्तर भारत): हिमालय से विंध्य पर्वतमाला तक विस्तृत। इसकी मुख्य विशेषता रेखा-प्रसाद शिखर, वर्गाकार गर्भगृह और आमलक व कलश थे (जैसे खजुराहो के चंदेल मंदिर, ओडिशा के लिंगराज व कोणार्क मंदिर)।
    2. द्रविड़ शैली (दक्षिण भारत): कृष्णा नदी से कन्याकुमारी तक विस्तृत। इसकी विशेषता पिरामिडनुमा बहुमंजिला शिखर (विमान), विशाल स्तंभों वाले मंडप और अत्यंत भव्य एवं ऊंचे प्रवेश द्वार (गोपुरम) थे। इसका चरमोत्कर्ष चोल स्थापत्य (तंजौर का बृहदेश्वर मंदिर) में दिखाई देता है।
    3. वेसर शैली (दक्कन): विंध्य और कृष्णा नदी के बीच चालुक्यों, राष्ट्रकूटों और होयसलों द्वारा विकसित मिश्रित शैली। एलोरा का एकाश्म कैलाश मंदिर (राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम द्वारा निर्मित) समूची चट्टान को ऊपर से नीचे काटकर बनाया गया विश्व का अद्वितीय आश्चर्य है।

6. प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला का तुलनात्मक अवलोकन

कालखंड / शैली मुख्य माध्यम व तकनीक प्रमुख स्थापत्य रूप प्रसिद्ध ऐतिहासिक उदाहरण
मौर्य कालचुनार का बलुआ पत्थर, चमकदार शीशे जैसी पॉलिशएकाश्म स्तंभ, ईंटों के स्तूप, प्रारंभिक गुफाएंसारनाथ का सिंह स्तंभ, सांची का मूल स्तूप, बराबर गुफाएं
मौर्य लोक कलाभूरे बलुआ पत्थर से तराशी गई सजीव प्रतिमाएंयक्ष एवं यक्षिणी की खुले आकाश में खड़ी मूर्तियांदीदारगंज (पटना) की यक्षिणी, बेसनगर की यक्षी
मौर्योत्तर कालपाषाण वेष्टनी, अलंकृत तोरण, शैलकर्तित तकनीकस्तूपों का विस्तार, अलंकृत द्वार, चैत्य और विहारसांची के तोरण द्वार, कार्ले का विशाल चैत्य, भरहुत स्तूप
गुप्त कालपाषाण एवं पकी ईंटें, प्रारंभिक शिखर निर्माणसपाट व प्रारंभिक शिखरयुक्त हिंदू मंदिरदेवगढ़ का दशावतार मंदिर, भीतरगांव का ईंटों का मंदिर
पूर्व-मध्य कालशैलकर्तित एवं संरचनात्मक मंदिर शैलियां (नागर/द्रविड़)बहुमंजिला विमान, गोपुरम, रेखा-प्रसाद शिखरतंजौर का बृहदेश्वर मंदिर, एलोरा का कैलाश मंदिर, खजुराहो

7. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. अशोक के स्तंभों की मुख्य वास्तुकला विशेषताएं क्या हैं?

अशोक के स्तंभ चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित एकाश्म (Monolithic) हैं। इनमें नीचे लंबा गोलाकार स्तंभ (यष्टि), उसके ऊपर उल्टा खिला हुआ कमल, उसके ऊपर एक गोल या चौकोर चौकी, और चौकी के शीर्ष पर पशु प्रतिमाएं (सिंह, हाथी, सांड या घोड़ा) होती थीं। इन स्तंभों पर एक अत्यंत विशिष्ट शीशे जैसी चमकदार पॉलिश की गई थी

Q2. स्तूप वास्तुकला में ‘हर्मिका’ का क्या महत्व है?

हर्मिका स्तूप के अर्धवृत्ताकार अंड के शीर्ष पर बनी एक चौकोर बालकनीनुमा संरचना होती थी। इसे स्तूप का सबसे पवित्र भाग माना जाता था क्योंकि इसी के भीतर सोने, चांदी या पाषाण की धातु मंजूषा में भगवान बुद्ध अथवा किसी महान बौद्ध संत के शारीरिक अवशेष सुरक्षित रखे जाते थे

Q3. बौद्ध गुफा वास्तुकला में ‘चैत्य’ और ‘विहार’ में क्या अंतर है?

  • चैत्य: यह बौद्ध भिक्षुओं और उपासकों का सामूहिक प्रार्थना एवं पूजा गृह होता था, जिसके पिछले भाग में एक पाषाण स्तूप बना होता था।
  • विहार: यह वर्षा ऋतु में बौद्ध भिक्षुओं के रहने का विश्राम स्थल (आवासीय मठ) होता था, जिसमें चारों तरफ भिक्षुओं के लिए छोटी कोठरियां बनी होती थीं।

Q4. मौर्यकालीन राजकीय कला और लोक कला में क्या मूल अंतर था?

राजकीय कला सम्राटों के सीधे संरक्षण में राजदरबार द्वारा विकसित की गई थी (जैसे अशोक के स्तंभ और बराबर की गुफाएं) और मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ ही समाप्त हो गई। इसके विपरीत, लोक कला सामान्य जनता और शिल्पियों द्वारा स्वतंत्र रूप से बनाई गई थी (जैसे दीदारगंज की यक्षिणी की प्रतिमाएं) और इसमें यथार्थवादी मानवरूपी मांसल शरीर को दर्शाया गया था

Q5. स्तूप वास्तुकला के प्रमुख अंगों के नाम क्या हैं?

स्तूप के मुख्य अंग हैं:

  1. अंड (अर्धवृत्ताकार ठोस गुंबद)
  2. हर्मिका (पवित्र अवशेष कक्ष)
  3. यष्टि (छत्र को थामने वाला केंद्रीय दंड)
  4. छत्रावली (बुद्ध, धम्म और संघ के प्रतीक तीन छत्र)
  5. प्रदक्षिणा पथ (परिक्रमा मार्ग)
  6. वेदिका (सुरक्षात्मक पाषाण रेलिंग)
  7. तोरण द्वार (अलंकृत प्रवेश द्वार)

Q6. गुप्तकालीन मंदिर वास्तुकला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कौन सा है?

उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में स्थित देवगढ़ का दशावतार मंदिर गुप्तकालीन मंदिर वास्तुकला का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। यह भारत के प्रारंभिक शिखरयुक्त मंदिरों में से एक है, जिसमें भगवान विष्णु को शेषनाग पर शयन करते हुए (शेषशायी विष्णु) अत्यंत सुंदर रूप में उकेरा गया है

Q7. एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर की क्या विशेषता है?

महाराष्ट्र के एलोरा में स्थित कैलाश मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने कराया था। यह मंदिर किसी ईंट या पत्थर को जोड़कर नहीं बनाया गया, बल्कि पूरी की पूरी पहाड़ी की ठोस बेसाल्ट चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर तराश कर (Top to Bottom Carving) निर्मित किया गया विश्व का सबसे बड़ा एकाश्म शैलकर्तित मंदिर है


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