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प्राचीन भारत में धार्मिक आंदोलन: अशोक का धम्म, तंत्रवाद, शंकराचार्य एवं दक्षिण का भक्ति आंदोलन

September 13, 2026 Sonu 1 min read

1. प्रस्तावना: प्राचीन भारत में धार्मिक चेतना का विकास

प्राचीन भारत का धार्मिक इतिहास स्थिर सिद्धांतों का संग्रह नहीं था, बल्कि यह सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के साथ निरंतर विकसित होने वाली एक जीवंत परंपरा थी

ऋग्वैदिक काल में प्राकृतिक शक्तियों के मानवीकरण से आरंभ होकर, उत्तर वैदिक काल में यह जटिल यज्ञीय कर्मकांडों में तब्दील हुआ। इसके प्रत्युत्तर में उपनिषदों, बौद्ध और जैन धर्म ने ज्ञान, आचरण और संन्यास पर बल दिया

मौर्य साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण के समय सम्राट अशोक ने एक सर्वसमावेशी राजधर्म के रूप में ‘धम्म’ का प्रतिपादन किया

मौर्योत्तर काल में भूमि अनुदानों के माध्यम से जब जनजातीय और सीमांत क्षेत्रों का समावेशन हुआ, तो आर्य और गैर-आर्य मान्यताओं के समन्वय से अवतारवाद, मूर्ति पूजा और भक्ति का अभ्युदय हुआ

गुप्त काल में छह प्रमुख आस्तिक दर्शन (षड्दर्शन) संहिताबद्ध हुए। इसके बाद गुप्तोत्तर काल में जनसामान्य और महिलाओं से जुड़ा तंत्रवाद उभरा, जिसने बौद्ध धर्म (वज्रयान) और हिंदू धर्म को गहराई से प्रभावित किया

अंततः दक्षिण भारत में अलवार और नयनार संतों के नेतृत्व में एक भावनात्मक सामाजिक-धार्मिक आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसे आगे चलकर आदि शंकराचार्य और रामानुजाचार्य जैसे आचार्यों ने सुदृढ़ दार्शनिक आधार प्रदान किया

2. मौर्य काल: सम्राट अशोक की धम्म नीति

कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) के पश्चात सम्राट अशोक ने पारंपरिक सैन्य विस्तार की नीति त्यागकर एक नैतिक संहिता के रूप में ‘धम्म’ को अपनी प्रशासनिक और सामाजिक नीति का आधार बनाया

  • क्या अशोक का धम्म बौद्ध धर्म था? यद्यपि अशोक व्यक्तिगत जीवन में एक समर्पित बौद्ध उपासक था (जिसका प्रमाण राजस्थान के भाब्रू शिलालेख में बुद्ध, धम्म और संघ रूपी ‘त्रिरत्न’ में उसकी आस्था तथा अपने शासन के 20वें वर्ष में बुद्ध के जन्मस्थल रुम्मिनदेई की यात्रा कर वहां बलि कर को समाप्त करने और भू-राजस्व को घटाकर 1/8 करने से मिलता है), परंतु उसका धम्म संकीर्ण बौद्ध धर्म नहीं था।
  • धम्म का वास्तविक स्वरूप: अशोक का धम्म सभी समकालीन धार्मिक पंथों के नैतिक तत्वों का एक साझा सार-संग्रह था। यह एक सार्वभौमिक ‘राजधर्म’ और सामाजिक आचार संहिता थी, जो “जियो और जीने दो” के सिद्धांत पर आधारित थी। इसके मुख्य नैतिक निर्देश निम्नलिखित थे:
    1. माता, पिता, गुरुजनों और वृद्धों का आदर एवं सेवा।
    2. दासों, भृतकों, निर्धनों और पशुओं के प्रति करुणा और दया का भाव।
    3. अल्प संचय (कम बचत) तथा अल्प व्यय (कम खर्च) की आदत।
    4. क्रोध, क्रूरता, ईर्ष्या, घमंड और हिंसा से दूर रहना।
    5. सभी संप्रदायों के प्रति सहिष्णुता और उनके सार की वृद्धि।
  • अशोक की धम्म नीति को प्रेरित करने वाले कारक:
    1. राजनीतिक कारक: अशोक का साम्राज्य उत्तर में हिंदूकुश से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक विस्तृत था। इतने विशाल साम्राज्य की एकता और अखंडता को केवल सैन्य बल से बनाए रखना असंभव था। अतः उसने बल प्रयोग के स्थान पर मेल-मिलाप और नैतिक सहमति (धम्म) को साम्राज्य को संगठित रखने का स्थायी माध्यम चुना।
    2. सांस्कृतिक कारक: साम्राज्य में विभिन्न धार्मिक समूह (ब्राह्मण, श्रमण, आजीवक आदि) निवास करते थे। उनके पारस्परिक संघर्ष और तनाव को समाप्त कर सह-अस्तित्व स्थापित करने के लिए धम्म आवश्यक था।
    3. आर्थिक कारक: इस काल में लोहे के हल से चलने वाली कृषि अर्थव्यवस्था का तीव्र विस्तार हो रहा था, जिसकी प्राथमिक आवश्यकता पशुधन की रक्षा थी। उस समय अंधाधुंध यज्ञीय पशुबलि से कृषि को भारी क्षति पहुंच रही थी। अशोक ने धम्म में अहिंसा पर बल देकर पशुधन की सुरक्षा सुनिश्चित की।
  • कौटिल्य और अशोक के दृष्टिकोण की तुलना:
    • कौटिल्य का मानना था कि “साध्य की पवित्रता साधन को उचित ठहराती है” (यथार्थवादी/अवसरवादी दृष्टिकोण), जबकि अशोक का मानना था कि “साधन की पवित्रता ही साध्य को तय करती है” (आदर्शवादी दृष्टिकोण)।
    • घरेलू शासन में कौटिल्य दंड नीति और दमनकारी शक्ति पर बल देता है, जबकि अशोक कम से कम दंड का उपयोग कर नैतिक चेतना से शासन चलाना चाहता था।
    • विदेश नीति में कौटिल्य का ‘राजमंडल सिद्धांत’ शक्ति-संतुलन और पड़ोसी राज्यों को जीतने पर आधारित था, जबकि अशोक ने ‘युद्ध विजय’ को त्यागकर ‘धम्म विजय’ की नीति अपनाई। उसने विदेशों में राजदूतों के स्थान पर शांति और कल्याण के लिए ‘धम्म महामात्र’ भेजे।

3. मौर्योत्तर काल: आर्य एवं गैर-आर्य समन्वय तथा अवतारवाद का उदय

200 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के मध्य भूमि अनुदानों के माध्यम से ब्राह्मण और बौद्ध भिक्षु सुदूर सीमावर्ती और जनजातीय क्षेत्रों में बसे। इसके परिणामस्वरूप आर्य और गैर-आर्य मान्यताओं के बीच एक गहरा समन्वय हुआ:

  • उपासना पद्धति में बदलाव: आर्यों की मुख्य पद्धति ‘यज्ञ’ थी, जबकि गैर-आर्यों की पद्धति ‘भक्ति’ और ‘मूर्ति पूजा’ थी। इस काल में यज्ञ के स्थान पर भक्ति और प्रतिमा पूजा मुख्यधारा में आ गई।
  • वैष्णव पंथ का विकास:
    • मथुरा क्षेत्र के वृष्णि कबीले के पंच-वीरों (वासुदेव कृष्ण, संकर्षण/बलराम, प्रद्युम्न, सांब और अनिरुद्ध) को जनजातीय नायकों से देवता का स्थान मिला (इसकी जानकारी मथुरा के मोरा अभिलेख, पाणिनी की अष्टाध्यायी और छांदोग्य उपनिषद से मिलती है)।
    • हिमालयी क्षेत्र के पशुचारकों के देवता नारायण का वासुदेव कृष्ण के साथ समन्वय हुआ।
    • अंततः वैदिक सौर देवता विष्णु को वासुदेव-कृष्ण और नारायण पर आरोपित कर दिया गया, जिससे भागवत अथवा वैष्णव धर्म का निर्माण हुआ।
  • शैव पंथ एवं अन्य देवी-देवता:
    • गैर-आर्य देवता शिव (जिनके बीज हड़प्पा सभ्यता में पशुपति के रूप में मिलते हैं) का वैदिक देवता रुद्र के साथ एकीकरण हुआ, जिससे शैव धर्म विकसित हुआ।
    • विभिन्न देवताओं में सामंजस्य स्थापित करने के लिए अवतारवाद की अवधारणा लाई गई, जिसके तहत विष्णु के 10 और शिव के 28 अवतारों की परिकल्पना की गई।
    • इसी काल में गैर-आर्य परंपराओं से गणेश, कार्तिकेय, मातृदेवी, यक्ष-यक्षिणी, नाग, पशु और वृक्ष पूजा को हिंदू धर्म में विधिवत शामिल किया गया।
  • बौद्ध धर्म में विभाजन (हीनयान बनाम महायान):कनिष्क के समय कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित चौथी बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म दो स्पष्ट शाखाओं में बंट गया:
    • हीनयान: बुद्ध की ऐतिहासिकता और उनके उपदेशों को मानता है; मोक्ष के लिए व्यक्ति को स्वयं प्रयास करना होता है (“अप्प दीपो भव”); प्रतीक चिन्हों (चरण पादुका, स्तूप) की पूजा करता है; इसकी भाषा पाली थी।
    • महायान: बुद्ध को भगवान मानकर उनकी मूर्तियों की पूजा करता है; इसके केंद्र में ‘बोधिसत्व’ की अवधारणा है, जो दूसरों के निर्वाण के लिए अपने मोक्ष को टालता है; यह गुणों के हस्तांतरण और ईश्वर की कृपा में विश्वास करता है; इसकी भाषा संस्कृत थी।

4. गुप्तकालीन धर्म एवं षड्दर्शन

गुप्त काल में ब्राह्मणवादी मान्यताओं का पुनरुत्थान हुआ, परंतु इसका स्वरूप वैदिक यज्ञों से भिन्न था:

  • पौराणिक भक्ति एवं त्रिदेव: यद्यपि समुद्रगुप्त और कुमारगुप्त प्रथम ने अश्वमेध यज्ञ किए, परंतु जनसामान्य में पुराणों पर आधारित व्यक्तिगत भक्ति लोकप्रिय हुई। इस काल में ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन) और महेश (संहार) के रूप में ‘त्रिदेव’ की संकल्पना स्थापित हुई।
  • मंदिर निर्माण एवं अवतार: देवताओं की मूर्तियों को अब भव्य मंदिरों (जैसे देवगढ़ का दशावतार मंदिर) में स्थापित किया जाने लगा। श्रीमद्भगवद्गीता भक्ति का सर्वोच्च ग्रंथ बनी।
  • षड्दर्शन (छह आस्तिक दर्शनों का संहिताबद्ध रूप): प्राचीन काल से चले आ रहे वैचारिक मत गुप्त काल तक छह प्रमुख दर्शनों के रूप में सुव्यवस्थित हुए:
    1. सांख्य दर्शन: इसके प्रवर्तक कपिल मुनि थे। यह सबसे प्राचीन दर्शन है, जो सृष्टि के निर्माण को ‘प्रकृति’ और ‘पुरुष’ के द्वैत संबंध से समझाता है।
    2. योग दर्शन: इसके प्रवर्तक महर्षि पतंजलि थे। यह चित्त की वृत्तियों के निरोध और अष्टांग योग द्वारा आत्म-नियंत्रण पर बल देता है।
    3. वैशेषिक दर्शन: इसके प्रवर्तक उलूक कणाद थे। यह भारत का भौतिकवादी परमाणु दर्शन है, जो सृष्टि को परमाणुओं के संघात से निर्मित मानता है।
    4. न्याय दर्शन: इसके प्रवर्तक अक्षपाद गौतम थे। यह विशुद्ध तर्कशास्त्र, प्रमाण और ज्ञानमीमांसा पर आधारित दर्शन है।
    5. मीमांसा (पूर्व मीमांसा): इसके प्रवर्तक महर्षि जैमिनि थे। इसका उद्देश्य वेदों के कर्मकांडीय भाग को तर्कसंगत ठहराना और वेदों की अपौरुषेयता स्थापित करना था।
    6. वेदांत (उत्तर मीमांसा): इसके मूल प्रवर्तक बादरायण (ब्रह्मसूत्र के रचयिता) थे। यह उपनिषदों के तत्व ज्ञान (ब्रह्म और आत्मा) की व्याख्या करता है।

5. गुप्तोत्तर काल: तंत्रवाद का उदय एवं प्रभाव

600 ईस्वी के बाद उत्तर भारत में तंत्रवाद सबसे प्रभावशाली धार्मिक और सामाजिक आंदोलन के रूप में उभरा:

  • तंत्रवाद का स्वरूप एवं पंचमकार: तंत्र साधना में तांत्रिक मंत्रों, जादुई क्रियाओं और विशेष रूप से ‘पंचमकारों’ की साधना पर बल दिया जाता था: मांस, मदिरा, मैथुन, मत्स्य और मुद्रा
  • सामाजिक क्रांति: तंत्रवाद ने रूढ़िवादी जाति व्यवस्था और पितृसत्तात्मक नियमों को सीधी चुनौती दी। इसने अपने दरवाजे शूद्रों और महिलाओं दोनों के लिए पूरी तरह खोल दिए। तंत्र साधना में महिलाओं को ‘गुरु’ और शक्ति का सर्वोच्च प्रतीक माना गया।
  • लौकिक दृष्टिकोण: यह केवल पारलौकिक मुक्ति का मार्ग नहीं था, बल्कि दैनिक जीवन के संकटों (जैसे सर्पदंश, रोग निवारण, शत्रु बाधा) को मंत्र-शक्ति से दूर करने का दावा करता था।
  • विभिन्न संप्रदायों पर प्रभाव:
    • शैव संप्रदाय: तंत्रवाद के प्रभाव से कापालिक और कालामुख शाखाएं निकलीं। कापालिक साधु श्मशान में निवास करते थे, नर-कपाल में भोजन करते थे और चिता की भस्म लगाते थे।
    • वैष्णव संप्रदाय: इसके अंतर्गत सहजिया शाखा का उदय हुआ।
    • शाक्त संप्रदाय: बंगाल और पूर्वी भारत में मातृदेवी (दुर्गा, काली) की तांत्रिक उपासना चरम पर पहुंची।
    • बौद्ध धर्म (वज्रयान): बौद्ध धर्म में तंत्रवाद के प्रवेश से वज्रयान शाखा बनी। इसमें बुद्ध के साथ उनकी शक्ति के रूप में स्त्री देवी ‘तारा’ की पूजा आरंभ हुई।

6. पूर्व-मध्य काल: पाल कालीन बौद्ध धर्म एवं नाथपंथ

  • पाल काल में बौद्ध धर्म का संरक्षण:7वीं सदी के बाद जब पूरे भारत में बौद्ध धर्म का पतन हो रहा था (हूणों के अत्याचार, आंतरिक कर्मकांड और वैदिक पुनरुत्थान के कारण), तब बंगाल और बिहार के पाल शासकों ने इसे पुनर्जीवन दिया:
    • पाल राजाओं ने जनसामान्य में लोकप्रिय वज्रयान शाखा को संरक्षण दिया।
    • उन्होंने नालंदा को सहायता दी तथा विक्रमशिला, ओदंतपुरी और सोमपुरा जैसे नए अंतरराष्ट्रीय बौद्ध विश्वविद्यालयों की स्थापना की।
    • ताड़पत्रों और वस्त्रों (चित्रपट) पर बौद्ध पांडुलिपियों और कला को संरक्षण दिया।
    • पाल संरक्षण के कारण ही बौद्ध धर्म का तिब्बत, नेपाल, भूटान और दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया के बोरोबुदुर मंदिर तक) में व्यापक प्रसार हुआ।
  • उत्तर भारत में नाथपंथी आंदोलन:10वीं शताब्दी में उत्तर भारत में मत्स्येंद्रनाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ ने नाथपंथ की स्थापना की।
    • यह एक शक्तिशाली धार्मिक व सामाजिक आंदोलन बना, जिसने ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता और जाति व्यवस्था का विरोध किया।
    • इन्होंने हठयोग, आंतरिक साधना और जनभाषा (उलटाबासियां) पर बल दिया।
    • नाथपंथ ने आगे चलकर कबीर, गुरु नानक और सूफी संतों (जैसे निजामुद्दीन औलिया) की विचारधारा को गहरे रूप से प्रभावित किया।

7. दक्षिण भारत का भक्ति आंदोलन एवं दार्शनिक आचार्य

छठी से ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य दक्षिण भारत (तमिल क्षेत्र) में एक अभूतपूर्व भावनात्मक भक्ति आंदोलन का सूत्रपात हुआ:

  • अलवार एवं नयनार संत:
    • अलवार संत (12): ये भगवान विष्णु के अनन्य उपासक थे। इनमें प्रसिद्ध महिला संत आंडाल (जिन्हें दक्षिण की मीरा कहा जाता है) और पांड्य शासक कुलशेखर शामिल थे। अलवारों के पदों का संकलन 10वीं सदी में ‘नालयिर दिव्य प्रबंधम’ नामक ग्रंथ में हुआ, जिसे दक्षिण में वेदों के समान पवित्र माना जाता है।
    • नयनार संत (63): ये भगवान शिव के उपासक थे। इनमें अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति प्रमुख थे। इनकी रचनाएं 12वीं सदी में ‘पेरियपुराणम’ में संकलित की गईं।
    • सामाजिक समानता: ये संत समाज के सभी वर्णों और जातियों (उच्च और निम्न) से आते थे। इन्होंने तमिल भाषा और गीतों के माध्यम से भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया और जातिगत भेदभाव को खारिज किया।
  • आदि शंकराचार्य और अद्वैत वेदांत:8वीं शताब्दी में शंकराचार्य ने हिंदू धर्म के पुनरुत्थान हेतु निम्नलिखित ऐतिहासिक कदम उठाए:
    1. अद्वैत वेदांत की स्थापना: उन्होंने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता पर भाष्य लिखकर अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया। उनका सिद्धांत था—“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः” (केवल ब्रह्म ही सत्य है, संसार मिथ्या/माया है, और जीव तथा ब्रह्म मूलतः एक ही हैं)।
    2. सामंजस्यवादी नीति: विद्वानों के लिए उच्च वेदांत ज्ञान दिया, जबकि सामान्य जनता के लिए सगुण रूप में शिव, विष्णु और शक्ति की मूर्ति पूजा को स्वीकार किया।
    3. चार मठों की स्थापना: भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करने के लिए चारों दिशाओं में चार पीठ स्थापित किए:
      • उत्तर: बद्रीनाथ (ज्योतिर्मठ)
      • दक्षिण: श्रृंगेरी (कर्नाटक)
      • पूर्व: पुरी (गोवर्धन मठ, ओडिशा)
      • पश्चिम: द्वारिका (शारदा मठ, गुजरात)
    4. बौद्ध संघों के प्रारूप पर संन्यासियों के संगठित संप्रदाय (दशनामी संप्रदाय) का गठन किया।
  • रामानुजाचार्य और विशिष्टाद्वैत दर्शन:12वीं शताब्दी में रामानुजाचार्य ने शंकराचार्य के निर्गुण अद्वैत में संशोधन कर उसे भक्ति के अनुकूल बनाया, जिसे विशिष्टाद्वैतवाद कहा जाता है:
    • ब्रह्म और जीव का संबंध: शंकराचार्य के अनुसार ब्रह्म और जीव पूर्णतः अभिन्न हैं। इसके विपरीत, रामानुज ने माना कि दोनों एक तत्व से बने हैं परंतु एक नहीं हैं; यदि ब्रह्म ‘परिमाण’ (समुद्र) है, तो जीव उसका ‘गुण’ (लहर) है।
    • मुक्ति का साधन (प्रपत्तिवाद): शंकर केवल ज्ञान को मोक्ष का साधन मानते थे, जबकि रामानुज के अनुसार ज्ञान आवश्यक है, परंतु उससे भी अधिक आवश्यक ईश्वर की कृपा (प्रपत्ति/शरणागति) है।
    • मोक्ष का स्वरूप: शंकर के अनुसार मुक्ति ब्रह्म में विलीन हो जाने में है। रामानुज के अनुसार मुक्ति ब्रह्म में समाप्त होने में नहीं, बल्कि वैकुंठ में ईश्वर के सान्निध्य में रहकर उनके मिलन के दिव्य आनंद का अनुभव करने में है।

8. प्राचीन भारतीय धार्मिक आंदोलनों का तुलनात्मक चार्ट

आंदोलन / दर्शन प्रमुख प्रवर्तक / नायक केंद्रीय सिद्धांत / विचार सामाजिक प्रभाव
अशोक का धम्मसम्राट अशोकनैतिक मूल्य, सहिष्णुता, अहिंसा, अल्प संचयविशाल साम्राज्य का शांतिपूर्ण एकीकरण
महायान बौद्ध धर्मकनिष्क के काल में विकसितबोधिसत्व, बुद्ध की मूर्ति पूजा, करुणाआम जनता में व्यापक प्रसार, मध्य एशिया विस्तार
तंत्रवादमत्स्येंद्रनाथ, तांत्रिक संप्रदायपंचमकार साधना, मंत्र शक्ति, शक्ति पूजामहिलाओं और शूद्रों को गुरु पद व पूर्ण धार्मिक अधिकार
वज्रयान बौद्ध धर्मपाल शासकों द्वारा समर्थिततांत्रिक बौद्ध साधना, देवी तारा की पूजातिब्बत, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रसार
दक्षिण भक्ति आंदोलन12 अलवार और 63 नयनार संतईश्वर के प्रति निस्वार्थ व्यक्तिगत प्रेम गीतजाति प्रथा का विरोध, तमिल भाषा को सम्मान
अद्वैत वेदांतआदि शंकराचार्यब्रह्म ही एकमात्र सत्य, ज्ञान मार्ग, चार मठहिंदू धर्म का दार्शनिक पुनरुत्थान
विशिष्टाद्वैतवादरामानुजाचार्यसगुण ब्रह्म, भक्ति, ईश्वर की कृपा (प्रपत्ति)भक्ति को दार्शनिक मान्यता, उत्तर भारत में प्रसार की नींव

9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. अशोक की धम्म नीति बौद्ध धर्म से किस प्रकार भिन्न थी?

अशोक का व्यक्तिगत धर्म बौद्ध था, परंतु उसका ‘धम्म’ कोई संप्रदाय नहीं बल्कि एक सर्वसमावेशी सामाजिक-नैतिक आचार संहिता थी। इसमें न तो चार आर्य सत्य या अष्टांगिक मार्ग का उल्लेख था और न ही निर्वाण की चर्चा। इसका केंद्रबिंदु माता-पिता का आदर, अहिंसा, अल्प व्यय और धार्मिक सहिष्णुता जैसे व्यावहारिक मानवीय मूल्य थे

Q2. प्राचीन भारत में अवतारवाद की अवधारणा क्यों विकसित की गई?

मौर्योत्तर काल में भूमि अनुदानों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों और जनजातियों के स्थानीय देवी-देवताओं का पारंपरिक हिंदू धर्म में प्रवेश हुआ। इन विभिन्न वैदिक और गैर-वैदिक देवताओं (जैसे वासुदेव-कृष्ण, नारायण, परशुराम, वराह) के मध्य दार्शनिक सामंजस्य स्थापित करने के लिए अवतारवाद लाया गया, ताकि सभी रूपों को परमेश्वर (विष्णु या शिव) का ही रूप माना जा सके

Q3. गुप्तोत्तर काल में तंत्रवाद को एक सामाजिक आंदोलन क्यों माना जाता है?

पारंपरिक ब्राह्मणवादी व्यवस्था में महिलाओं और शूद्रों को वेदों के अध्ययन और संन्यास का अधिकार नहीं था। इसके विपरीत, तंत्रवाद ने जातिगत और लैंगिक भेदभाव को पूरी तरह समाप्त कर अपने द्वार शूद्रों और महिलाओं के लिए खोल दिए तथा महिलाओं को साधना में सर्वोच्च ‘गुरु’ का पद भी प्रदान किया

Q4. पाल वंश के शासनकाल को भारतीय बौद्ध धर्म के इतिहास में संजीवनी क्यों कहा जाता है?

7वीं-8वीं सदी में जब हूण आक्रमणों, आंतरिक विकृतियों और शंकराचार्य के वैचारिक अभियानों के कारण शेष भारत से बौद्ध धर्म लगभग लुप्त हो रहा था, तब बंगाल और बिहार के पाल शासकों ने इसे राजकीय संरक्षण दिया। उन्होंने विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे नए विश्वविद्यालय स्थापित किए और तिब्बत व दक्षिण-पूर्व एशिया में इसका प्रचार सुनिश्चित कर इसे जीवित रखा

Q5. अलवार और नयनार संतों में क्या मुख्य अंतर था?

  • अलवार संत: कुल 12 थे और वे भगवान विष्णु के अनन्य उपासक थे। इनकी रचनाएं ‘नालयिर दिव्य प्रबंधम’ में संकलित हैं।
  • नयनार संत: कुल 63 थे और वे भगवान शिव के उपासक थे। इनकी रचनाएं ‘पेरियपुराणम’ में संकलित हैं।

Q6. आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन और रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत में क्या मूल अंतर है?

शंकराचार्य के अनुसार संसार मिथ्या (माया) है और जीव तथा ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है; मोक्ष केवल ज्ञान से संभव है। इसके विपरीत, रामानुजाचार्य के अनुसार संसार और जीव भी सत्य हैं (ब्रह्म के अंग हैं); मोक्ष केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि ईश्वर की अनन्य भक्ति और उनकी कृपा (प्रपत्ति) से प्राप्त होता है

Q7. शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठ कौन से हैं और वे कहां स्थित हैं?

शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों पर चार पीठ स्थापित किए:

  1. उत्तर में बद्रीनाथ (उत्तराखंड) – ज्योतिर्मठ।
  2. दक्षिण में श्रृंगेरी (कर्नाटक) – श्रृंगेरी शारदा पीठ।
  3. पूर्व में जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) – गोवर्धन मठ।
  4. पश्चिम में द्वारिका (गुजरात) – शारदा मठ।

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