राजस्थान में भक्ति आंदोलन केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने सामाजिक कुरीतियों, बाह्य आडंबरों, जातिगत संकीर्णताओं और ऊंच-नीच के भेदभाव के विरुद्ध एक सशक्त सांस्कृतिक क्रांति का रूप लिया।
1. राजस्थान की भक्ति परंपरा का दार्शनिक वर्गीकरण
भक्ति आंदोलन का प्रादुर्भाव दक्षिण भारत में हुआ (“भक्ति द्रविड़ि उपजी लाए रामानंद, प्रकट किया कबीर ने सप्तद्वीप नवखंड“)। रामानंद जी इसे उत्तर भारत में लेकर आए और उनके शिष्यों ने इसे व्यापक आधार दिया।
(A) सगुण भक्ति मार्ग (Saguna Bhakti)
- सैद्धांतिक आधार: ईश्वर के साकार स्वरूप की आराधना, मूर्ति पूजा में पूर्ण विश्वास, भजन, कीर्तन, नृत्य, माला फेरना, संगीत व बाह्य साधनों को भक्ति का अनिवार्य अंग मानना।
- प्रमुख वैष्णव संप्रदाय: वल्लभ संप्रदाय (शुद्धाद्वैत मत, कृष्ण बाल स्वरूप पूजा), गौड़ीय संप्रदाय (चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित), निम्बार्क संप्रदाय (राधा-कृष्ण की युगल उपासना) तथा रामानंदी संप्रदाय।
- प्रमुख शैव संप्रदाय: पाशुपत / लकुलीश संप्रदाय (उदयपुर का एकलिंगनाथ जी मंदिर), कापालिक संप्रदाय (अघोरी, सुरापान, श्मशान साधना), कालदमन, नाथ संप्रदाय, लिंगायत मत एवं कश्मीरी शैव मत।
- प्रमुख सगुण संत: भक्त शिरोमणि मीराबाई, संत रानाबाई, गवरी बाई (वागड़ की मीरा) तथा भक्त कवि दुर्लभ (वागड़ के नरसिंह)।
(B) निर्गुण भक्ति मार्ग (Nirguna Bhakti)
- सैद्धांतिक आधार: ईश्वर के निराकार, अगुण एवं निर्विशेष रूप की उपासना; मूर्ति पूजा व कर्मकांडों का पूर्ण विरोध; शब्द साधना, नाम-स्मरण, आंतरिक शुद्धि और समाधि परंपरा पर बल[cite: 1, 6]।
- प्रमुख निर्गुण संप्रदाय: विश्नोई संप्रदाय, जसनाती संप्रदाय, दादूपंथ, रामस्नेही संप्रदाय, लालदासी संप्रदाय, नवल संप्रदाय, अलखिया संप्रदाय, परिणामी संप्रदाय, लश्करी संप्रदाय (संत बालानंदाचार्य) एवं गूदड़ संप्रदाय (संत नवलदास)।
- प्रमुख निर्गुण संत: संत कबीर, संत रैदास (रविदास), संत पीपा तथा संत धन्ना।
(C) सगुण-निर्गुण मिश्रित भक्ति मार्ग (Mixed Stream)
- सैद्धांतिक आधार: परम तत्व को निर्गुण निराकार मानते हुए भी व्यवहार और साधना में सगुण स्वरूप (प्रतिमा, युगल छवि अथवा गुरु विग्रह) का समन्वय करना।
- प्रमुख संप्रदाय:
- चरणदासी संप्रदाय: संत चरणदास जी द्वारा स्थापित; सगुण व निर्गुण का समन्वय, राधा-कृष्ण की सखी भाव से युगल पूजा।
- निष्कलंक संप्रदाय: संत मावजी (वागड़ के धनी) द्वारा प्रवर्तित।
- निरंजनी संप्रदाय: संत हरिदास जी (हरिसिंह सांखला – ‘राजस्थान के वाल्मीकि’) द्वारा प्रवर्तित।
2. नियमों पर आधारित राजस्थान के तीन प्रमुख संप्रदाय (तुलनात्मक विश्लेषण)
| आयाम | विश्नोई संप्रदाय | जसनाती संप्रदाय | चरणदासी संप्रदाय |
| प्रवर्तक | संत जांभोजी (गुरु जांबेश्वर) | संत जसनाथ जी | संत चरणदास जी |
| कुल नियम | 29 नियम (20 + 9) | 36 नियम | 42 नियम |
| कुल शब्द (दीक्षा मंत्र) | 120 शब्द | 150 शब्द | — |
| उपासना स्वरूप | निर्गुण निराकार विष्णु (विष्णु अवतार मान्यता) | निर्गुण निराकार ब्रह्मा (योग प्रधान साधना) | निर्गुण-सगुण मिश्रित (श्रीकृष्ण की सखी भाव से पूजा) |
| पवित्र प्रतीक / वस्तुएँ | खेजड़ी (शमी/माटो), हरिण (काला हिरण), पाहल जल | जाल वृक्ष, मोर पंख, गले में 3 गांठों वाला काली ऊन का धागा | पीले रंग के वस्त्र, पुष्कर स्नान, एकादशी व्रत |
| प्रधान पीठ | मुकाम (तालवा, नोखा, बीकानेर) | कतरियासर (बीकानेर) | दिल्ली (मूल जन्म: डेहरा, अलवर) |
3. प्रमुख निर्गुण संप्रदायों का गहन विश्लेषण
(A) विश्नोई संप्रदाय एवं संत जांभोजी महाराज
- जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी), 1451 ई. को पीपासर (नागौर) में पंवार वंशीय राजपूत कुल में जन्म।
- माता-पिता: लोहट जी पंवार एवं हंसा देवी।
- बचपन व मूल नाम: धनराज; बाल्यावस्था में मौन रहने के कारण इन्हें ‘गेहला’ भी कहा गया।
- पेनोरमा: पीपासर (नागौर)।
- संप्रदाय की स्थापना: 1485 ई. में समराथल धोरा (धोक धोरा, बीकानेर) में भीषण अकाल के समय कलश स्थापना कर विश्नोई संप्रदाय की नींव रखी। यहाँ इन्होंने कठोर तपस्या की, ज्ञान प्राप्त किया और अपना प्रथम उपदेश दिया।
- नामकरण: 29 (20 + 9) नियमों के पालन एवं जांभोजी को भगवान विष्णु का अवतार मानने के कारण अनुयायी ‘विश्नोई’ कहलाए।
- दीक्षा: कान में 120 शब्द सुनाकर तथा ‘पाहल’ (अभिमंत्रित जल) पिलाकर संप्रदाय में दीक्षित किया जाता है।
- सामाजिक व पर्यावरणीय दर्शन:
- जांभोजी विश्व के प्रथम पर्यावरण वैज्ञानिक संत माने जाते हैं। आदर्श वाक्य: “सिर साठे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण”।
- पवित्र प्रतीक: खेजड़ी (शमी/माटो) और हरिण (काला हिरण)।
- उपदेश स्थल: साथरी (सथारी)।
- अनुयायी: सर्वाधिक अनुयायी जांगल प्रदेश (बीकानेर एवं जोधपुर क्षेत्र) के जाट समाज से हैं।
- समकालीन प्रभाव: दिल्ली सुल्तान सिकंदर लोदी और बीकानेर शासक राव लूणकरण इनके आध्यात्मिक प्रभाव से मिलने जांगल प्रदेश आए थे।
- प्रमुख तीर्थ एवं समाधि स्थल:
- मुकाम (तालवा, नोखा, बीकानेर): लालासर में देह त्यागने के उपरांत मुकाम में इनकी पावन समाधि स्थापित हुई, जो संप्रदाय की प्रधान पीठ है।
- जांबेश्वर मेला: मुकाम में वर्ष में दो बार (आश्विन अमावस्या व फाल्गुन अमावस्या) मेला आयोजित होता है, जिसे ‘विश्नोइयों का कुंभ’ कहा जाता है।
- अन्य तीर्थ स्थल: पीपासर (नागौर), समराथल धोरा (बीकानेर), लालासर (बीकानेर), जांगलू (बीकानेर), जांभा (फलोदी), रामड़ावास (जोधपुर), रोटू (नागौर)।
- साहित्यिक धरोहर एवं संत परंपरा:
- ग्रंथ: जंभसागर (जिसमें 29 नियमों व 120 शब्दों का संकलन है), जंभगीता (विश्नोई धर्म का 5वां वेद व 19वां पुराण), जंभ संहिता, विश्नोई धर्म प्रकाश, जंभवाणी (जंभवेद)।
- प्रमुख विश्नोई संत:
- मेहोजी गोदारा: तुलसीदास कृत रामचरितमानस से पूर्व इन्होंने राजस्थानी भाषा में प्रथम ‘रामायण’ की रचना की।
- विलो जी: कथा जैसलमेर की ग्रंथ के रचयिता।
- श्रवण भोकर: शीत पुराण ग्रंथ के रचयिता।
(B) जसनाती संप्रदाय एवं संत जसनाथ जी (सिद्ध परंपरा व अग्नि नृत्य)
- जन्म एवं दीक्षा: 1482 ई. में कतरियासर (बीकानेर) के डाबला तालाब पर हमीर जी ज्याणी (जाट) एवं रूपांदे को प्राप्त हुए।
- गुरु: गोरखनाथ।
- तपस्या: गोरखमालिया (बीकानेर) में 12 वर्षों तक कठोर हठयोग साधना की।
- साधना, समाधि एवं समकालीन प्रभाव:
- भक्ति की अपेक्षा योग साधना एवं निर्गुण निराकार ब्रह्मा की उपासना पर सर्वाधिक बल दिया।
- दिल्ली सुल्तान सिकंदर लोदी ने इनके चमत्कारों से प्रभावित होकर कतरियासर के निकट 500 बीघा भूमि भेंट की।
- मात्र 24 वर्ष की अल्पायु में 1506 ई. (आश्विन शुक्ल सप्तमी) को कतरियासर में जीवित समाधि ली।
- आचार संहिता एवं अनुयायियों का वर्गीकरण:
- कुल 36 नियम व 150 शब्द।
- पवित्र वस्तुएँ: जाल का वृक्ष, मोर पंख तथा गले में 3 गांठों वाला काली ऊन का धागा धारण करना अनिवार्य।
- अनुयायियों की श्रेणियाँ:
- सिद्ध: मंदिरों में पूजा-अर्चना करने वाले मुख्य साधक।
- परमहंस: आजीवन अविवाहित, विरक्त एवं संन्यासी संत।
- जसनाती जाट: गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए 36 नियमों का पालन करने वाले अनुयायी।
- जसनाती संतों का समाधि स्थल ‘बाडिया’ कहलाता है।
- मेला एवं अग्नि नृत्य (Folk Art Nuance):
- मेला: कतरियासर (बीकानेर) में प्रतिवर्ष तीन बार (चैत्र, माघ और आश्विन मास की शुक्ल सप्तमी) मेला भरता है।
- अग्नि नृत्य (फायर डांस): जसनाती सिद्ध पुरुषों द्वारा 7 फीट लंबे व 4 फीट चौड़े अंगारों के ढेर (धूणा) पर नंगे पाँव किया जाता है।
- विशेषताएँ: नर्तक ‘नाचणिया’ कहलाते हैं; मुख्य वाद्य नगाड़ा है। नर्तक अपने गुरु (सिद्ध रुस्तम जी) से आज्ञा लेकर ‘सिद्ध रुस्तम जी’ व ‘फतेह-फतेह’ का उद्घोष करते हुए धूणे में प्रवेश करते हैं।
- क्रियाएँ: नृत्य के दौरान अंगारों से मतीरा फोड़ना, हल चलाना जैसी कृषि क्रियाएँ की जाती हैं, जिस कारण इसे ‘आग के साथ राग व फाग का नृत्य’ कहा जाता है।
- संरक्षण: बीकानेर महाराजा गंगा सिंह जी ने इस नृत्य को विशेष संरक्षण दिया। ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार मुगल शासक औरंगजेब सिद्ध रुस्तम जी के अग्नि नृत्य से चमत्कृत होकर नगाड़ा (नकारा), निशान (ध्वजा) और संपूर्ण भारत में भ्रमण हेतु ताम्रपत्र भेंट किया था।
- साहित्य एवं प्रमुख संत:
- ग्रंथ: सिंभूधड़ा, कोंडा, सिद्ध जीरो सिरलोको।
- रामनाथ जी: इन्होंने ‘यशोनाथ पुराण’ की रचना की, जिसे ‘जसनाती संप्रदाय की बाइबिल’ कहा जाता है।
- लालनाथ जी: इन्होंने ‘जीव समझौत्री’ ग्रंथ की रचना की।
- अन्य संत: चौखनाथ जी, सवाईनाथ जी तथा सिद्ध रुस्तम जी।
(C) दादूपंथ एवं संत दादू दयाल (‘राजस्थान के कबीर’)
- जन्म एवं प्रारंभिक जीवन: 1544 ई. (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) को अहमदाबाद (गुजरात) में जन्म; साबरमती नदी में लोदीराम ब्राह्मण को तैरते मिले।
- गुरु: संत बुद्धन (वृद्धानंद जी / ब्रह्मानंद जी)।
- उपनाम: डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने इन्हें ‘राजस्थान का कबीर’ कहा (आडंबरों, कुरीतियों के विरोध तथा सधुक्कड़ी शैली के कारण)।
- राजस्थान में केंद्र एवं यात्राएँ (पंचतीर्थ):
- सांभर (जयपुर): 1568 ई. में आए, धुनिया (कपास धुनने) का कार्य किया और प्रथम उपदेश दिया। 1574 ई. में दादूपंथ की स्थापना यहीं से मानी जाती है।
- आमेर (जयपुर): 1575 ई. में 25 शिष्यों के साथ आए और 14 वर्ष रहे।
- कल्याणपुर (जयपुर): साधना का महत्वपूर्ण केंद्र।
- नरेणा (नारायणा, जयपुर): 1602 ई. में आए; 1603 ई. में देह त्यागी। यह दादूपंथ की प्रधान पीठ है।
- दादू खोल (दादू पालका, भैराणा पहाड़ी, जयपुर): यहाँ दादू जी का पार्थिव शरीर रखा गया। (मान्यता: दादूपंथी शव को न जलाते हैं, न दफनाते हैं, बल्कि प्रकृति के ऋण से मुक्ति हेतु वन्य जीवों के आहारार्थ खुले में छोड़ते हैं)।
- समकालीन ऐतिहासिक संदर्भ:
- आमेर शासक भगवंत दास एवं मानसिंह प्रथम इनके समकालीन थे।
- 1585 ई. में भगवंत दास के सहयोग से फतेहपुर सीकरी में मुगल सम्राट अकबर से 40 दिनों तक आध्यात्मिक संवाद किया।
- दादूपंथ की संगठनात्मक संरचना व परंपरा:
- आंदोलन: निपक (निष्पक्ष) आंदोलन चलाया।
- मंदिर: दादूद्वारा (जहाँ किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि दादू जी के ग्रंथ ‘वाणी’ की पूजा होती है)।
- सत्संग स्थल: अलख दरीबा।
- अभिवादन: ‘सत्यराम’।
- शिष्य परंपरा: कुल 152 शिष्य, जिनमें 100 एकांतवासी तथा 52 मुख्य प्रचारक ’52 स्तंभ’ कहलाए।
- दादूपंथ की 5 प्रमुख शाखाएँ:
- खालसा शाखा: प्रधान पीठ नरेणा (जयपुर); संस्थापक दादू जी के ज्येष्ठ पुत्र संत गरीबदास जी (सहयोगी भाई मिस्किन दास जी)।
- नागा शाखा: प्रवर्तक सुंदरदास जी (बड़े); यह हथियारबंद विरक्त साधुओं की शाखा थी।
- उत्तरादे (स्थानधारी) शाखा: प्रवर्तक संत बनवारीदास जी; इन्होंने रतिया (हिसार, हरियाणा) में जाकर उत्तर भारत में पीठ स्थापित की।
- विरक्त शाखा: सांसारिक बंधनों से पूर्णतः मुक्त संन्यासियों का समूह।
- खाकी शाखा: शरीर पर भस्म रमाने वाले साधु।
- साहित्यिक धरोहर:
- दादू जी ने अपने उपदेश ढूंढाड़ी भाषा में दिए।
- प्रमुख ग्रंथ: दादूजी री वाणी (मानसिंह प्रथम के काल में संकलित), दादूजी रा दूहा, कायाबेली, संतगुण सागर, नाममाला, परिचय का अंग, हरड़े वाणी।
- प्रमुख शिष्य एवं उनकी साहित्यिक कृतियाँ:
- संत रज्जब जी (सांगानेर, जयपुर): पठान कुल में जन्म; दादू जी के उपदेश सुनकर विवाह मंडप से विरक्त हुए और आजीवन दूल्हे के वेश में रहकर धर्मोपदेश दिए। ग्रंथ: सबंगी एवं रज्जबवाणी।
- सुंदरदास जी (छोटे): दादूपंथ के सर्वाधिक विद्वान संत। इन्होंने ढूंढाड़ी के स्थान पर परिष्कृत हिंदी व पिंगल शैली में रचनाएँ कीं।
- अन्य शिष्य: बालिंद जी (ग्रंथ: आरिलो), जनगोपाल, जगन्नाथ दास, माधवदास तथा बखना जी (मिरासी जाति से)।
(D) रामस्नेही संप्रदाय एवं संत रामचरण जी
- दार्शनिक स्वरूप: निर्गुण निराकार ‘राम’ की उपासना (यह दशरथ पुत्र सगुण राम नहीं, बल्कि सर्वव्यापी ब्रह्म हैं)। मूर्ति पूजा का पूर्ण निषेध।
- आचार संहिता: साधु गुलाबी रंग के वस्त्र धारण करते हैं, दाढ़ी-मूंछ व सिर का मुंडन रखते हैं; अभिवादन वाक्य ‘राम-राम’ है तथा पूजा स्थल ‘रामद्वारा’ कहलाता है।
- चार प्रमुख शाखाएँ एवं संस्थापक (Complete Matrix):
| शाखा (पीठ) | संस्थापक आचार्य | गुरु / आदि आचार्य | विशिष्ट सांस्कृतिक तथ्य एवं साहित्य |
| शाहपुरा (भीलवाड़ा) (अंतरराष्ट्रीय प्रधान पीठ) | संत रामचरण जी (मूल नाम: रामकिशन; जन्म: सोडा, टोंक) | संत कृपाराम जी (दांतड़ा, मेवाड़) | • ग्रंथ: अणभैवाणी (अनुभव वाणी)। • शाहपुरा शासक रणसिंह ने छतरी व मठ बनवाया। • फूलडोल महोत्सव: चैत्र कृष्ण एकम से पंचमी (होली के अगले दिन से 5 दिवसीय)। |
| रेण (मेड़ता, नागौर) | संत दरियाव जी (जन्म: जैतारण, पाली; धुनिया पठान परिवार) | संत प्रेमदास जी | • हिंदू-मुस्लिम समन्वय: ‘रा’ = राम, ‘म’ = मुहम्मद। |
| सींथल (बीकानेर) | संत हरिरामदास जी | जयमलदास जी (सींथल व खेड़ापा के आदि आचार्य) | • ग्रंथ: ‘निशानी’ (प्राणायाम, योग व निर्गुण साधना संबंधी ग्रंथ)। |
| खेड़ापा (जोधपुर) | संत रामदास जी | जयमलदास जी | • सींथल परंपरा का विस्तार एवं निर्गुण राम भक्ति का प्रचार। |
(E) रामानंद जी के प्रमुख निर्गुण शिष्य
1. संत पीपा जी महाराज
- पृष्ठभूमि: 1425 ई. (चैत्र पूर्णिमा) को गागरोन दुर्ग (झालावाड़) में खींची राजपूत परिवार में जन्म। मूल नाम: प्रताप सिंह खींची (गागरोन के शासक)।
- माता-पिता: कड़ावाराम खींची एवं लक्ष्मीवती।
- दीक्षा एवं वैराग्य: स्वामी रामानंद जी के गागरोन आगमन पर अपनी छोटी रानी सीता सहित राजपाठ त्याग कर काशी गए और संन्यास लिया।
- सांस्कृतिक योगदान व तीर्थ:
- राजस्थान में निर्गुण भक्ति परंपरा की अलख जगाने वाले प्रथम संत।
- दर्शन: इन्होंने कहा—“भक्ति बिनु मुक्ति नहीं”।
- आराध्य देव: दर्जी समुदाय इन्हें अपना आराध्य देव मानता है (वृंदावन में इन्होंने आजीविका हेतु वस्त्र सिलने का कार्य किया تھا)।
- मंदिर: समदड़ी (बालोतरा/बाड़मेर) में लूणी नदी तट पर; चैत्र पूर्णिमा को विशाल मेला भरता है।
- गुफा: टोडा रायसिंह (टोंक), जहाँ इन्होंने साधना की और ज्ञान प्राप्त किया।
- छतरी व समाधि: गागरोन दुर्ग (झालावाड़) में आहू व कालीसिंध नदियों के संगम पर।
- साहित्य: हस्तलिखित ग्रंथ ‘जोग चिंतामणि’ (जिसमें इनके उपदेश संग्रहित हैं)।
2. संत धन्ना जी (राजस्थान में भक्ति आंदोलन के जनक)
- पृष्ठभूमि: 1415 ई. में धुवन (धुआं कलां, टोंक) के जाट (हर्षतवाल गोत्र) परिवार में जन्म। पिता: रामेश्वर जी।
- दीक्षा एवं साधना: काशी जाकर स्वामी रामानंद जी से दीक्षा ली।
- सांस्कृतिक महत्व:
- राजस्थान में भक्ति आंदोलन का श्रीगणेश (जनक) करने वाले प्रथम संत।
- मोक्ष प्राप्ति का साधन ‘गुरु भक्ति एवं नाम स्मरण’ बताया। हठपूर्वक भगवान को भोजन कराने की कथा प्रचलित है।
- इनके उपदेश सिखों के पवित्र ग्रंथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संकलित हैं।
- अनुयायी: राजस्थान के पश्चात इनके सर्वाधिक अनुयायी पंजाब राज्य में हैं।
- तीर्थ: मुख्य मंदिर बोरानाडा (जोधपुर) तथा भव्य पेनोरमा धुवन (टोंक) में स्थापित है।
3. संत रैदास (रविदास) जी
- पृष्ठभूमि: काशी (वाराणसी) में चर्मकार परिवार में जन्म; स्वामी रामानंद के शिष्य।
- राजस्थान से संबंध: भक्त शिरोमणि मीराबाई ने इन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु बनाया।
- छतरी: चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कुंभश्याम मंदिर के परिसर में संत रैदास की 4 खंभों की छतरी बनी है।
- साहित्य: इनके पद ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संकलित हैं तथा उपदेश ग्रंथ ‘संत रैदास की पर्ची’ कहलाता है।
(F) अन्य प्रमुख निर्गुण संप्रदाय
1. संत लालदास जी (लालदासी संप्रदाय)
- जन्म एवं पृष्ठभूमि: 1504 ई. (श्रावण कृष्ण पंचमी) को धोलीदूब (अलवर) में मेव मुस्लिम परिवार में जन्म। पिता: चांदमल, माता: समदा।
- दीक्षा: तिजारा के चिश्ती फकीर गदन चिश्ती से दीक्षा ली। तपोभूमि: बांधोली की ‘सिंह शिला’ पहाड़ी।
- संप्रदाय की मान्यताएँ: निर्गुण राम की उपासना; अभिवादन ‘जय राम’।
- दीक्षा की कठोर परंपरा: अहंकार नाश हेतु शिष्य का मुंह काला कर, गधे पर उल्टा बिठाकर पूरे गाँव में घुमाया जाता है और अंत में मीठा शरबत पिलाया जाता है।
- सर्वाधिक अनुयायी मेव मुसलमान हैं।
- प्रमुख तीर्थ:
- प्रधान पीठ: नंगला जहाज (भरतपुर), जहाँ इनका देहावसान हुआ।
- समाधि स्थल: शेरपुर (अलवर)।
- मेला: आश्विन शुक्ल एकादशी व माघ पूर्णिमा को आयोजित।
- साहित्य: लालदास की चेतावनियां।
2. महर्षि नवलराम जी (नवल संप्रदाय)
- पृष्ठभूमि: नागौर जिले के हरसोलाव गाँव में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (वि.सं. 1840) को मेघवाल/दलित परिवार में जन्म (भक्त इसे ‘नवल जयंती’ मनाते हैं)।
- दीक्षा व विचार: रामानंदी संप्रदाय के संत कीर्ताराम जी से दीक्षा लेकर निर्गुण-निराकार ईश्वर की उपासना की। इन्होंने जाति-पांति, छुआछूत, सती प्रथा, पर्दा प्रथा व बाल विवाह का कड़ा विरोध किया तथा शिक्षा पर बल दिया।
- प्रधान पीठ: जोधपुर (जोधपुर महाराजा मानसिंह इनका अत्यधिक सम्मान करते थे)।
- साहित्य: मारवाड़ी भाषा में रचित पद, साखियां व चौपाइयां।
3. परिणामी संप्रदाय (संत प्राणनाथ जी)
- प्रवर्तक: संत प्राणनाथ जी।
- दार्शनिक स्वरूप: निर्गुण भक्ति धारा का समर्थन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की पूजा।
- प्रधान पीठ: पन्ना (मध्य प्रदेश); राजस्थान में मुख्य केंद्र आदर्शनगर (जयपुर)।
- आधार ग्रंथ: ‘कुलजम स्वरूप’।
4. गूदड़ संप्रदाय (संत दास जी)
- प्रधान पीठ: दांतड़ा (भीलवाड़ा)।
- परंपरा: संत गुदड़ी (फटे-पुराने वस्त्रों के बिस्तर) पर बैठकर उपदेश देते थे तथा स्वयं भी गुदड़ी के वस्त्र पहनते थे।
5. लश्करी संप्रदाय (संत बालानंदाचार्य जी)
- स्वरूप: निर्गुण धारा के हथियारबंद साधु; बालानंदाचार्य जी को ‘लश्कर संत’ कहा जाता है।
- ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भ: इन्होंने मुगल शासक औरंगजेब के विरुद्ध हिंदू धर्म व 52 देव प्रतिमाओं की रक्षा की तथा मेवाड़ महाराणा राजसिंह व मारवाड़ के वीर दुर्गादास राठौड़ को सैन्य-आध्यात्मिक सहायता दी।
4. सगुण-निर्गुण (मिश्रित) भक्ति धारा
(A) संत चरणदास जी (चरणदासी संप्रदाय)
- जन्म एवं पृष्ठभूमि: 1703 ई. में डेहरा (अलवर) के वैश्य परिवार में जन्म। मूल नाम: रणजीत। गुरु: सुखदेव मुनि।
- दार्शनिक स्वरूप: निर्गुण व सगुण का अनूठा समन्वय; कबीरपंथ से अत्यधिक साम्य। श्रीकृष्ण की आराधना सखी भाव से करते हैं।
- आचार संहिता: कुल 42 नियम। साधु सदैव पीले रंग के वस्त्र पहनते हैं। पुष्कर स्नान तथा एकादशी व्रत को सर्वोच्च मान्यता दी गई है। आधार ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता।
- प्रधान पीठ: दिल्ली। (जयपुर महाराजा सवाई प्रतापसिंह ने 1782 ई. में इनके दर्शन कर जयपुर में कोलीवाड़ा गाँव भेंट किया था)।
- ऐतिहासिक भविष्यवाणी: इन्होंने 1739 ई. में ईरान के शासक नादिरशाह के भारत आक्रमण की सटीक भविष्यवाणी वर्षों पूर्व कर दी थी।
- प्रमुख महिला शिष्याएँ:
- सहजोबाई: इन्हें ‘मत्स्य संघ की मीरा’ तथा राजस्थान की प्रथम साध्वी संत माना जाता है। ग्रंथ: सहज प्रकाश।
- दयाबाई: ग्रंथ: दयाबोध एवं विनयमालिका।
(B) संत मावजी महाराज (निष्कलंक संप्रदाय एवं बेणेश्वर धाम)
- जन्म एवं पृष्ठभूमि: 1714 ई. में साबला (डूंगरपुर) में औदीच्य ब्राह्मण परिवार में जन्म।
- अवतार मान्यता एवं उपनाम: भगवान विष्णु के 10वें ‘कल्कि अवतार’ (निष्कलंक अवतार) माने जाते हैं। इन्हें ‘वागड़ का धनी’ कहा जाता है।
- परीक्षा भेद: ‘वागड़ का धनी’ संत मावजी हैं; जबकि ‘बांगड़ का धनी’ नरहड़ के पीर (हजरत शक्कर बार शाह, झुंझुनूं) कहलाते हैं।
- सामाजिक सुधार: वागड़ व मेवाड़ क्षेत्र के भीलों के उद्धार हेतु ‘लसाड़िया आंदोलन’ चलाया।
- बेणेश्वर धाम (आदिवासियों का कुंभ):
- सोम, माही व जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम (नवातपुरा, डूंगरपुर) पर बेणेश्वर धाम की स्थापना की।
- विशेषता: भारत का एकमात्र तीर्थ जहाँ स्वयंभू खंडित शिवलिंग (5 स्थानों से खंडित) की विधिवत पूजा होती है। यहाँ माघ पूर्णिमा को विशाल मेला भरता है।
- मावजी के दो प्रमुख शिष्यों—अहजे व वाजे ने बेणेश्वर में लक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण करवाया था।
- मंदिर व प्रतिमा विधान: साबला स्थित मुख्य मंदिर में मावजी की घोड़े पर सवार, चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा व पद्म धारण किए हुए पाषाण प्रतिमा है।
- साहित्यिक धरोहर (चोपड़ा): वागड़ी बोली में संवाद शैली में रचित भविष्यवाणियों के 5 बड़े ग्रंथ ‘चोपड़ा’ कहलाते हैं (लगभग 72 लाख 96 हजार छंद)। ये केवल दीपावली के दिन श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ निकाले जाते हैं।
- अन्य केंद्र: पुंजपुर व दालावाला (डूंगरपुर), पालोदा (बांसवाड़ा) तथा सेसपुर (सलूंबर)।
(C) संत हरिदास जी (निरंजनी संप्रदाय)
- जन्म व मूल नाम: 1455 ई. में कापड़ोद (डीडवाना) में सांखला राजपूत कुल में जन्म। मूल नाम: हरिसिंह सांखला।
- कायाकल्प: प्रारंभिक जीवन में डकैत थे; संत उपदेश व हड़बूजी सांखला की प्रेरणा से हृदय परिवर्तन हुआ और कठोर तपस्या कर संत बने। इन्हें ‘राजस्थान का वाल्मीकि’ कहा जाता है।
- निरंजनी संप्रदाय: ईश्वर को ‘अलख निरंजन’ अथवा ‘हरि निरंजन’ मानकर उपासना की जाती है। प्रधान पीठ गाढ़ा (डीडवाना) में स्थित है।
- साहित्य: मंत्र राजप्रकाश एवं हरिपुरुष जी की वाणी।
5. प्रमुख सगुण संप्रदाय (वैष्णव एवं शैव परंपरा)
(A) वल्लभ संप्रदाय (पुष्टिमार्ग)
- संस्थापक: महाप्रभु वल्लभाचार्य जी; दार्शनिक मत: शुद्धाद्वैतवाद।
- साधना पद्धति: पुष्टिमार्ग (ईश्वर के अनुग्रह/पुष्टि पर आश्रित); भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप (श्रीनाथ जी) की अष्टसखा मंडली द्वारा अष्टछाप सेवा।
- प्रधान पीठ:श्रीनाथ जी मंदिर (नाथद्वारा, राजसमंद)।
- सांस्कृतिक आयाम: हवेली संगीत, पिछवाई कला तथा कार्तिक शुक्ल एकम को आयोजित होने वाला विख्यात अन्नकूट महोत्सव।
- अन्य प्रमुख मंदिर: द्वारकाधीश मंदिर (कांकरोली, राजसमंद), मथुरेश जी (कोटा), गोकुलचंद्र जी (कामां, डीग)।
- राजकीय अनुयायी: किशनगढ़ के सावंत सिंह (नागरीदास – जिनके समय ‘बणी-ठणी’ चित्र बना) तथा कोटा के महाराणा भीमसिंह (जिन्होंने अपना नाम कृष्णदास व कोटा का नाम नंदग्राम रख दिया था)।
(B) निम्बार्क संप्रदाय (हंस / सनकादिक संप्रदाय)
- संस्थापक: निम्बार्काचार्य जी; मत: द्वैताद्वैतवाद।
- उपासना स्वरूप: भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधारानी की स्वकीया पत्नी के रूप में युगल पूजा। मारवाड़ में संप्रदाय के साधु ‘निमावत साध’ कहलाते हैं।
- प्रधान पीठ:सलेमाबाद (किशनगढ़, अजमेर)।
- स्थापना: 16वीं शताब्दी में आचार्य परशुराम देवाचार्य जी द्वारा रूपनगढ़ नदी तट पर स्थापित। यहाँ परशुराम जी की चरण पादुकाओं की पूजा होती है।
- मेला: राधाष्टमी (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी) को सलेमाबाद में मेला लगता है, जहाँ महाप्रसाद के रूप में खिचड़ी वितरित की जाती है।
(C) रामानंदी संप्रदाय (रामानुज शाखा)
- प्रवर्तक: स्वामी रामानंद जी। उत्तर भारत में भक्ति को स्थापित किया।
- राजस्थान में दो प्रमुख शाखाएँ:
- गलताजी पीठ (जयपुर):
- संस्थापक: संत कृष्णदास जी पयहारी (केवल दुग्धाहार करने के कारण पयहारी कहलाए)।
- सांस्कृतिक संदर्भ: इन्होंने गलताजी में नाथ संप्रदाय के संत चतुरनाथ को शास्त्रार्थ में पराजित कर वैष्णव पीठ की स्थापना की।
- उपनाम: गलताजी को ‘उत्तर तोताद्री’ तथा बंदरों की बहुतायत के कारण ‘मंकी वैली’ कहा जाता है।
- राजकीय शिष्य: आमेर शासक पृथ्वीराज कछवाहा एवं उनकी रानी बालाबाई (ढूंढाड़ की मीरा) इनके अनन्य शिष्य थे।
- रेवासा पीठ (सीकर) – रसिक संप्रदाय:
- संस्थापक: संत अग्रदास जी (कृष्णदास पयहारी के शिष्य)।
- उपासना विधान: भगवान श्री राम की पूजा सीता जी के साथ रसिक नायक के रूप में और माधुर्य भाव से की जाती है।
- गलताजी पीठ (जयपुर):
(D) गौड़ीय संप्रदाय (चैतन्य संप्रदाय)
- प्रवर्तक: चैतन्य महाप्रभु (गौड़ प्रदेश, बंगाल)।
- राजस्थान में केंद्र: मुख्य पीठ गोविंद देव जी मंदिर (जयपुर); मूर्ति मूलतः वृंदावन के सवाई राधा गोविंद मंदिर से सवाई जयसिंह द्वारा लाई गई थी। अन्य मंदिर: मदन मोहन जी (करौली) व गोपीनाथ जी (जयपुर)।
6. राजस्थान की प्रमुख महिला संत
(A) भक्त शिरोमणि मीराबाई (‘राजस्थान की राधा’)
- जन्म एवं वंश: 1498 ई. में कुड़की गाँव (पाली/ब्यावर) में मेड़तिया राठौड़ परिवार में जन्म; पिता: रतन सिंह, दादा: राव दूदा।
- विवाह: 1516 ई. में मेवाड़ महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र कुंवर भोजराज के साथ; अल्पायु में वैधव्य प्राप्त।
- भक्ति स्वरूप: श्रीकृष्ण की माधुर्य भाव (कांता भाव) से सगुण आराधना।
- आध्यात्मिक गुरु: काशी के संत रैदास (रविदास)।
- साहित्य: मीराबाई री पदावलियां, नरसी जी रो मायरो (रत्ना खाती के सहयोग से), गीत गोविंद री टीका, सत्यभामा जी नूं रूसणों, रुक्मणी मंगल।
(B) संत रानाबाई (‘राजस्थान की दूसरी मीरा’)
- जन्म एवं पृष्ठभूमि: 1504 ई. (वैशाख शुक्ल तृतीया / आखा तीज) को हरनावा (मकराना, डीडवाना-कुचामन) के जाखड़ जाट परिवार में जन्म। पिता: रामगोपाल, माता: गंगाबाई।
- गुरु एवं भक्ति: पालड़ी के संत चतुरदास जी महाराज की शिष्या; भगवान कृष्ण की अनन्य सगुण उपासक।
- जीवित समाधि: 1570 ई. में हरनावा में जीवित समाधि ली; प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी को यहाँ विशाल मेला भरता है।
(C) अन्य प्रमुख महिला संत
- गवरी बाई (वागड़ की मीरा): डूंगरपुर की कृष्ण भक्त साध्वी; ग्रंथ: कीर्तनमाला। डूंगरपुर महारावल शिवसिंह ने इनके लिए 1829 ई. में बालमुकुंद मंदिर बनवाया।
- सहजोबाई एवं दयाबाई: संत चरणदास जी की शिष्याएँ; मेवाती भाषा में निर्गुण-सगुण मिश्रित रचनाएँ कीं। सहजोबाई को ‘मत्स्य संघ की मीरा’ कहा जाता है।
- कर्मा बाई (मारवाड़ की मीरा): कालवा (नागौर) की जाट साध्वी; भगवान जगन्नाथ को हठपूर्वक थाली भरकर खीचड़ा खिलाने की लोक मान्यता।
- बालाबाई (ढूंढाड़ की मीरा): आमेर के राजा पृथ्वीराज कछवाहा की रानी तथा संत कृष्णदास पयहारी की शिष्या।
7. संप्रदाय एवं उनकी प्रमुख पीठें (Quick Revision Matrix)
| संप्रदाय का नाम | दार्शनिक धारा | संस्थापक संत | राजस्थान में प्रधान पीठ / केंद्र |
| विश्नोई संप्रदाय | निर्गुण | संत जांभोजी | मुकाम (तालवा, नोखा, बीकानेर) |
| जसनाती संप्रदाय | निर्गुण (हठयोग) | संत जसनाथ जी | कतरियासर (बीकानेर) |
| दादूपंथ | निर्गुण | संत दादू दयाल | नरेणा (नारायणा, जयपुर) |
| रामस्नेही संप्रदाय | निर्गुण | संत रामचरण जी | शाहपुरा (भीलवाड़ा) |
| चरणदासी संप्रदाय | सगुण-निर्गुण (मिश्रित) | संत चरणदास जी | दिल्ली (मूल: डेहरा, अलवर) |
| निष्कलंक संप्रदाय | सगुण-निर्गुण (मिश्रित) | संत मावजी | साबला (डूंगरपुर) / बेणेश्वर धाम |
| निरंजनी संप्रदाय | सगुण-निर्गुण (मिश्रित) | संत हरिदास जी | गाढ़ा (डीडवाना) |
| लालदासी संप्रदाय | निर्गुण | संत लालदास जी | नंगला जहाज (भरतपुर) |
| निम्बार्क संप्रदाय | सगुण (वैष्णव) | परशुराम देवाचार्य (राजस्थान) | सलेमाबाद (किशनगढ़, अजमेर) |
| रामानंदी (रसिक) | सगुण (वैष्णव) | संत अग्रदास जी | रेवासा (सीकर) |
| पाशुपत / लकुलीश | सगुण (शैव) | लकुलीश मुनि | एकलिंगनाथ जी मंदिर (कैलाशपुरी, उदयपुर) |
| गूदड़ संप्रदाय | निर्गुण | संत दास जी | दांतड़ा (भीलवाड़ा) |
| नवल संप्रदाय | निर्गुण | महर्षि नवलराम जी | जोधपुर |
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