1. करणी माता (देशनोक, बीकानेर)
- जन्म एवं वंश: 1387 ईस्वी (वि.सं. 1444, आश्विन शुक्ल सप्तमी) को सुवाप गाँव (जोधपुर) में चारण कुल (किनीय शाखा) के मेहाजी चारण एवं देवल बाई के घर जन्म। मूल नाम: ऋद्धि बाई।
- उपनाम एवं स्वरूप: दाढ़ी वाली डोकरी, चूहों वाली देवी, जगत माता का अवतार, काबा वाली करणी।
- प्रतीक व वाहन: सफेद चील (सफेद चील का दिखना साक्षात करणी माता का दर्शन माना जाता है)।
- चूहे (काबा):
- मंदिर में विचरण करने वाले चूहे ‘काबा’ कहलाते हैं।
- सांस्कृतिक मान्यता: चारण समाज (विशेषकर देपावत शाखा) इन चूहों को अपना पूर्वज मानता है; मान्यता है कि देपावत चारण मृत्यु के बाद काबा बनते हैं और काबा मृत्यु के बाद पुनः चारण कुल में जन्म लेते हैं।
- सफेद काबा का दर्शन अत्यंत शुभ माना जाता है।
- स्थापत्य एवं मंदिर (Architecture):
- स्थान:देशनोक (बीकानेर)।
- निर्माण: मूल मंदिर का निर्माण राव बीका द्वारा करवाया गया; आधुनिक संगमरमरी स्वरूप बीकानेर महाराजा सूरत सिंह तथा गंगा सिंह द्वारा प्रदान किया गया।
- नेहड़ी जी: देशनोक के पास स्थित वह स्थल जहाँ करणी माता स्वयं बिलौना (दही मथने का कार्य) करती थीं (यहाँ का खेजड़ी वृक्ष आज भी पवित्र माना जाता है)।
- सांस्कृतिक परंपरा एवं साहित्य:
- पुजारी: करणी माता के पुजारी देपावत चारण होते हैं।
- चिरजा (चारण चर्चा): माता की स्तुति में गाए जाने वाले भक्ति गीतों को ‘चिरजा’ कहा जाता है (दो रूप: ‘घड़ाऊ’ – संकट निवारण हेतु; ‘सिंघाऊ’ – शांतिकाल में भक्ति हेतु)।
- मेला: वर्ष में दो बार (चैत्र व आश्विन नवरात्र) में लक्खी मेला भरता है।
- कुलदेवी / इष्टदेवी: बीकानेर के राठौड़ राजवंश की इष्टदेवी तथा चारण समाज की कुलदेवी।
2. जीण माता (रेवासा, सीकर)
- जन्म एवं पृष्ठभूमि: घांघू गाँव (चूरू) के चौहान वंशीय राजपूत कुल में जन्म। भाई: हर्ष।
- तपोभूमि एवं मंदिर स्थापत्य:
- स्थान:रेवासा (सीकर), काजल शिखर की तलहटी में।
- निर्माण: 1064 ईस्वी (वि.सं. 1121) में पृथ्वीराज चौहान प्रथम के शासनकाल में हट्टड़ (राजा हट्ट) द्वारा मंदिर का निर्माण करवाया गया।
- हर्ष भैरव मंदिर: निकट ही पहाड़ी पर इनके भाई हर्ष का भैरव रूप में भव्य मंदिर स्थित है।
- उपनाम एवं ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रसंग:
- मधुमक्खियों की देवी (भंवर माता): मुगल सम्राट औरंगजेब ने जब मंदिर को खंडित करने हेतु सेना भेजी, तब माता के प्रकोप से भौंरों (मधुमक्खियों) के झुंड ने मुगल सेना पर हमला कर दिया। पराजित होकर औरंगजेब ने क्षमा मांगी और अखंड दीपक हेतु दिल्ली के शाही खजाने से प्रतिवर्ष सवा मन तेल/घी भेजने का फरमान जारी किया (यह परंपरा बाद में भी जारी रही)।
- सीकर के चौहानों की कुलदेवी तथा मीणा जाति की आराध्य देवी।
- लोक साहित्य एवं वाद्य यंत्र (Artistic Dimension):
- राजस्थान के लोक साहित्य में सर्वाधिक लंबा लोकगीत: जीण माता का लोकगीत संपूर्ण राजस्थानी लोक साहित्य में सबसे लंबा (लगभग 48-50 मिनट का आख्यान) माना जाता है।
- गायन पद्धति: यह गीत कनफटे जोगियों द्वारा केसरिया वस्त्र धारण कर, डमरू एवं सारंगी वाद्य यंत्रों की संगति में करुण रस में गाया जाता है।
- मेला: चैत्र एवं आश्विन नवरात्र में विशाल मेला आयोजित होता है।
3. कैला देवी (त्रिकूट पर्वत, करौली)
- स्थान एवं भौगोलिक परिवेश: करौली में कालीसिल नदी के तट पर त्रिकूट पर्वत की घाटी में भव्य मंदिर स्थित है।
- अवतार एवं मान्यता:
- भगवान श्रीकृष्ण की बहन (योगमाया / महामाया) का अवतार, जो कंस के हाथ से छूटकर आकाश में विलीन हो गई थीं।
- इन्हें अंजना माता (हनुमान जी की माता) का अवतार भी माना जाता है।
- कुलदेवी संबंध: करौली के यदुकुल (जादौन/यादव राजवंश) की कुलदेवी।
- अनुष्ठान, लोकगीत एवं नृत्य (Cultural Performance):
- लांगुरिया गीत: कैला देवी की आराधना में भक्तों द्वारा गाए जाने वाले विशिष्ट भक्ति गीत ‘लांगुरिया गीत’ कहलाते हैं। (लांगुरिया हनुमान जी का प्रतीक स्वरूप है)।
- लांगुरिया नृत्य व घुटन नृत्य: मंदिर प्रांगण में मीणा व गुर्जर भक्तों द्वारा घुटनों के बल बैठकर ‘घुटकन नृत्य’ तथा लांगुरिया नृत्य किया जाता है।
- मेला: चैत्र शुक्ल अष्टमी को विशाल ‘लक्खी मेला’ भरता है।
- बोहरा भगत की छतरी: मंदिर परिसर के ठीक सामने स्थित छतरी, जहाँ नवजात शिशुओं व बालकों के झाड़-फूंक द्वारा रोगों का निवारण किया जाता है।
4. शीला देवी (आमेर दुर्ग, जयपुर)
- स्थापना एवं स्वरूप:
- मूर्ति मूलतः काले संगमरमर (कसौटी पत्थर) की महिषासुरमर्दिनी रूप में उत्कीर्ण अष्टभुजा प्रतिमा है।
- मूर्ति के ऊपरी भाग पर पंचदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश और सूर्य) की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं।
- प्रतिष्ठापन: 16वीं शताब्दी के अंत में आमेर महाराजा मानसिंह प्रथम द्वारा पूर्वी बंगाल के राजा केदार को पराजित कर जसोर (वर्तमान बांग्लादेश) से यह शिला/प्रतिमा लाई गई और आमेर के जलेब चौक में प्रतिष्ठित करवाई गई।
- कुलदेवी / इष्टदेवी भेद:
- कछवाहा राजवंश की कुलदेवी: जमवाय माता (जमुवारामगढ़)।
- कछवाहा राजवंश की इष्टदेवी / आराध्य देवी: शीला देवी।
- पूजा विधान: देवी को ‘ढाई प्याला मदिरा’ का चरणामृत/भोग चढ़ाने की अनूठी परंपरा रही है। चैत्र व आश्विन नवरात्र में विशेष पूजा अर्चना होती है।
5. शीतला माता (सील की डूंगरी, चाकसू, जयपुर)
- मंदिर एवं स्थापना: सील की डूंगरी (चाकसू, जयपुर)। वर्तमान मंदिर का निर्माण जयपुर महाराजा माधोसिंह प्रथम द्वारा करवाया गया।
- उपनाम: चेचक की देवी, सेडल माता, बच्चों की संरक्षिका देवी, महामाई, बोदरी देवी।
- विशिष्ट प्रतीक एवं पूजा विधान:
- राजस्थान की एकमात्र लोक देवी जिनकी खंडित प्रतिमा की पूजा की जाती है।
- वाहन: गधा।
- पुजारी: कुम्हार जाति के लोग।
- प्रतीक: मिट्टी के सकोरे (दीपक) तथा हाथ में झाड़ू व नीम की टहनी।
- उत्सव एवं सांस्कृतिक परंपरा:
- बासोड़ा (शीतलाष्टमी): चैत्र कृष्ण अष्टमी को बासोड़ा पर्व मनाया जाता है। इस दिन गर्म (ताजा) भोजन नहीं बनाया जाता; एक दिन पूर्व (सप्तमी की रात) बने ठंडे बासी भोजन का भोग माता को अर्पित किया जाता है और वही ग्रहण किया जाता है।
- बैलगाड़ी मेला: शीतला माता का चाकसू मेला पारंपरिक रूप से ‘बैलगाड़ी मेले’ के रूप में विख्यात है, जिसमें किसान व ग्रामीण सजी-धजी बैलगाड़ियों से पहुँचते हैं।
6. अन्य महत्वपूर्ण लोक देवियाँ (Comprehensive Regional Matrix)
| लोक देवी | मुख्य मंदिर / स्थान | कुलदेवी / इष्टदेवी संबंध | विशिष्ट सांस्कृतिक व अनुष्ठानिक तथ्य |
| आई माता | बिलाड़ा (जोधपुर) | सिरवी जाति की कुलदेवी | • बाबा रामदेवजी की अनन्य शिष्या। • मुख्य मंदिर को ‘दरगाह’ तथा अन्य पूजा स्थलों को ‘बडेर’ कहा जाता है। • मंदिर की अखंड ज्योति से कालिख के स्थान पर केसर टपकता है। • संप्रदाय में 11 नियमों का पालन होता है। |
| सच्चियाय माता | ओसियां (जोधपुर) | ओसवाल (महाजन) समाज की कुलदेवी | • मंदिर का निर्माण परमार राजा उपलदेव द्वारा महा-मारू (गुर्जर-प्रतिहार) शैली में करवाया गया। • महिषासुरमर्दिनी स्वरूप; हिंदू-जैन सांप्रदायिक सौहार्द की प्रतीक। |
| दधिमती माता | गोठ-मांगलोद (नागौर/डीडवाना-कुचामन) | दाधीच (दाहिमा) ब्राह्मणों की कुलदेवी | • गुर्जर-प्रतिहार कालीन नागर शैली का प्राचीन मंदिर। • मंदिर के मंडप व स्तंभों पर वाल्मीकि रामायण के दृश्य पाषाण पर उकेरे गए हैं। |
| नारायणी माता | बरवा डूंगरी (राजगढ़, अलवर) | नाई (सेन) समाज की कुलदेवी | • पति का नाम कर्मेती जी। • विशिष्ट विवाद/परंपरा: पूजा के अधिकार को लेकर नाई समाज और मीणा समाज के मध्य परंपरा (पुजारी मीणा जाति के होते हैं)। |
| सुगाली माता | आउवा (पाली) | आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत की इष्टदेवी | • 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की देवी मानी जाती हैं। • 10 सिर और 54 भुजाओं वाली काले पाषाण की अद्वितीय प्रतिमा। |
| आशापुरा माता | 1. नाडोल (पाली) 2. मोदरा (महोदरी माता, जालौर) 3. पोकरण (जैसलमेर) | जालौर के सोनगरा चौहानों एवं बिस्सा ब्राह्मणों की कुलदेवी | • बिस्सा ब्राह्मण समाज की महिलाएँ पूजा के समय हाथों में मेहंदी नहीं लगातीं और वर-वधू को फेरों के समय विशिष्ट मर्यादा रखनी होती है। |
| शाकंभरी माता (सकराय माता) | 1. सांभर (जयपुर) 2. उदयपुरवाटी (नीमकाथाना/झुंझुनूं) | सांभर के चौहानों की कुलदेवी (सांभर); खंडेलवाल वैश्य समाज की कुलदेवी (उदयपुरवाटी) | • अकाल के समय कंद-मूल, फल और शाक-भाजी उत्पन्न कर जनता की रक्षा की, अतः ‘शाकंभरी’ कहलाईं। |
| ब्राह्मणी माता | सौरसन (अंता, बारां) | हाड़ौती अंचल की प्रसिद्ध लोक देवी | • विश्व का एकमात्र मंदिर जहाँ देवी की पीठ का श्रृंगार, पूजा व भोग लगाया जाता है (मुख की पूजा नहीं होती)। • यहाँ माघ शुक्ल सप्तमी को प्रसिद्ध गधों का मेला भरता है। |
| विरात्रा माता | चौहटन (बाड़मेर) | भोपों (गोंद निकालने वाले/भोपा समाज) की कुलदेवी | • चौहटन गोंद उत्पादन हेतु राजस्थान में प्रसिद्ध है। • वर्ष में तीन बार (चैत्र, भाद्रपद और माघ सुदी तेरस) मेला भरता है। |
| घेवर माता | राजसमंद झील की पाल (राजसमंद) | मेवाड़ अंचल | • राजस्थान की एकमात्र लोक देवी जो बिना पति के अकेली सती हुईं। • महाराणा राजसिंह द्वारा राजसमंद झील की नींव इनके हाथों रखवाई गई थी। |
| आवड़ माता (स्वांगिया माता) | भादरिया / तेमड़ा पर्वत (जैसलमेर) | जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी | • सुगन चिड़ी (सगुणी चिड़िया) को इनका प्रतीक माना जाता है। • इनका मुख्य अस्त्र मुड़ा हुआ भाला (स्वांग) था, जिसके कारण इन्हें ‘स्वांगिया माता’ कहा गया। |
| बाण माता (बायण माता) | नागदा / चित्तौड़गढ़ | मेवाड़ के गुहिल / सिसोदिया राजवंश की कुलदेवी | • मूल मंदिर नागदा में; बाद में चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थापित। |
| तनोट माता | तनोट (जैसलमेर) | थार के सीमा प्रहरियों की देवी | • ‘थार की वैष्णो देवी’ व ‘रुमालों वाली देवी’ कहलाती हैं। • 1965 के भारत-पाक युद्ध में मंदिर पर गिरे बम निष्प्रभावी रहे; मंदिर का प्रबंधन बीएसएफ (BSF) के जवानों द्वारा किया जाता है। |
| आवरी माता | निकुंभ (चित्तौड़गढ़) | लोक आस्था केंद्र | • लकवा (पक्षाघात) एवं पोलियो ग्रस्त रोगियों के उपचार हेतु विख्यात मंदिर। |
| बड़ली माता | आकोला (चित्तौड़गढ़) | लोक आस्था केंद्र | • बेड़च नदी तट पर; मंदिर में दो तीवरियों (ताखों) से बच्चों को निकालने पर बीमारियाँ दूर होने की मान्यता। |
7. प्रमुख जनजातीय लोक देवियाँ (Tribal Folk Goddesses)
- कंजर जनजाति:
- जोगणिया माता (भीलवाड़ा): कंजर समाज की कुलदेवी।
- चौथ माता (चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर): कंजर जाति की प्रमुख आराध्य देवी। अपराध या जोखिम भरे कार्य पर जाने से पूर्व आशीर्वाद लेने की परंपरा ‘पाती मांगना’ कहलाती है।
- सहरिया जनजाति:
- कोड़िया देवी: सहरिया जनजाति की कुलदेवी।
- भील जनजाति:
- कंठेश्वरी माता: आदिवासियों / भीलों की लोक देवी।
- कथौड़ी जनजाति:
- भारी माता एवं कंसारी माता: कथौड़ी समाज की प्रमुख देवियाँ।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास (Analytical Prelims Drill)
प्रश्न 1. राजस्थान की लोक देवियों एवं उनसे जुड़ी विशिष्ट परंपराओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- जीण माता का लोकगीत राजस्थान के संपूर्ण लोक साहित्य में सबसे लंबा है, जिसका गायन कनफटे जोगियों द्वारा डमरू और सारंगी पर किया जाता है।
- करणी माता के मंदिर में सफेद चील का दिखाई देना अत्यंत शुभ और साक्षात माता का दर्शन माना जाता है।
- सौरसन (बारां) स्थित ब्राह्मणी माता के मंदिर में देवी के मुख की पूजा न होकर केवल उनकी पीठ की पूजा व श्रृंगार किया जाता है।
- आमेर की शीला देवी कछवाहा राजवंश की कुलदेवी हैं, जिनकी स्थापना महाराजा मानसिंह प्रथम ने करवाई थी।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सत्य हैं?
(A) केवल 1, 2 और 4
(B) केवल 2, 3 और 4
(C) केवल 1, 2 और 3
(D) 1, 2, 3 और 4
प्रश्न 2. निम्नलिखित को सही सुमेलित कीजिए:
| सूची-I (लोक देवी) | सूची-II (विशिष्ट लक्षण / परंपरा) |
| a. आई माता | 1. 10 सिर और 54 भुजाओं वाली प्रतिमा |
| b. शीतला माता | 2. अखंड दीपक से केसर टपकना |
| c. सुगाली माता | 3. लांगुरिया गीत एवं घुटकन नृत्य |
| d. कैला देवी | 4. खंडित स्वरूप में पूजा एवं गधा वाहन |
कूट:
(A) a-2, b-4, c-1, d-3
(B) a-4, b-2, c-1, d-3
(C) a-2, b-1, c-4, d-3
(D) a-3, b-4, c-1, d-2
मुख्य परीक्षा अभ्यास (Mains Answer Writing)
प्रश्न 1 (50 शब्द / 5 अंक):
“राजस्थान में कुलदेवी और इष्टदेवी (आराध्य देवी) की संकल्पना में क्या आधारभूत भेद है? जयपुर के कछवाहा राजवंश के उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।”
प्रश्न 2 (100 शब्द / 10 अंक): राजस्थान की लोक देवियों की उपासना परंपरा में लोक-चिकित्सा, पर्यावरण चेतना तथा सामाजिक समरसता के तत्व किस प्रकार अंतर्निहित हैं? शीतला माता, करणी माता तथा जीण माता के विशेष संदर्भ में आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
