1. ऋग्वैदिक काल का भौगोलिक विस्तार
प्रारंभिक दौर में आर्य समूह विभिन्न चरणों में भारत आए। इसके परिणामस्वरूप, उनका स्थानीय निवासियों से संघर्ष और समन्वय दोनों हुआ।
- सप्त सैंधव क्षेत्र: आर्यों का आरंभिक निवास उत्तर-पश्चिम में था। यह क्षेत्र पूर्वी अफगानिस्तान, पंजाब, सिंध, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैला था।
- नदियों का उल्लेख: ऋग्वेद में सिंधु और उसकी सहायक नदियों का विवरण मिलता है। इनमें वितस्ता (झेलम), आसिकनी (चिनाब), परुष्णी (रावी), शतद्रु (सतलज) और विपाशा (व्यास) शामिल थीं। साथ ही, पवित्र सरस्वती नदी का भी उल्लेख है।
- पूर्वी सीमा: ऋग्वेद में यमुना नदी का उल्लेख तीन बार हुआ है। इसके विपरीत, गंगा नदी की चर्चा केवल एक बार मिलती है। अतः यमुना नदी को ही ऋग्वैदिक आर्यों की पूर्वी सीमा माना जाता है।
2. उत्तर वैदिक काल में क्षेत्रीय प्रसार
आगे चलकर, सभ्यता का केंद्र पूर्व की ओर खिसक गया। फलस्वरूप, आर्यों का विस्तार गंगा-यमुना के ऊपरी दोआब तक हो गया।
- कुरु राज्य: ऊपरी दोआब के उत्तरी भाग में कुरु राज्य स्थापित हुआ। राजा परीक्षित और जनमेजय इसके प्रमुख शासक थे। जनमेजय ने दो सर्प सत्र यज्ञ भी किए थे।
- पांचाल राज्य: ऊपरी दोआब के मध्य भाग में पांचाल राज्य बना। प्रवाहण जैवाली इस राज्य के महत्वपूर्ण दार्शनिक शासक थे।
- मध्य गंगा घाटी में विस्तार: कालांतर में, सभ्यता सरयू, वरणवती और गंडक (सदानीरा) नदियों तक पहुंची। इसके परिणामस्वरूप कोशल, काशी और विदेह राज्य अस्तित्व में आए। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, विदेह माधव ने जंगलों को जलाकर विदेह राज्य की स्थापना की थी।
3. बुद्ध काल एवं 16 महाजनपदों का उदय
उत्तर वैदिक काल के जनपदों ने विकसित होकर महाजनपदों का रूप ले लिया। इसलिए छठी शताब्दी ईसा पूर्व को महाजनपद काल कहा जाता है।
- महाजनपदों का विवरण: बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में 16 महाजनपदों की सूची मिलती है।
- शासन प्रणाली: इनमें से 14 राज्यों में राजतंत्र व्यवस्था थी। इसके विपरीत, वज्जि और मल्ल दो प्रमुख गणराज्य थे।
- मगध की प्रधानता: शीघ्र ही, मगध ने अन्य महाजनपदों को अपने नियंत्रण में ले लिया। अतः उत्तर-पश्चिम में व्यास नदी से लेकर दक्षिण में गोदावरी तक मगध का प्रभाव फैल गया।
4. मगध के उत्कर्ष के प्रमुख कारण
मगध की सफलता के पीछे अनेक अनुकूल कारक मौजूद थे।
- भौगोलिक व आर्थिक सुरक्षा: मगध की राजधानियां (राजगृह और पाटलिपुत्र) प्राकृतिक रूप से सुरक्षित थीं। इसके अलावा, समीपवर्ती जंगलों में लोहे और तांबे के विशाल भंडार थे। उपजाऊ मध्य गंगा घाटी ने राज्य को मजबूत आर्थिक आधार दिया।
- महत्वाकांक्षी शासकों की नीतियां:
- हर्यंक वंश: बिंबिसार ने अंग को जीता और वैवाहिक संबंधों से काशी प्राप्त किया। इसके बाद, अजातशत्रु ने कोशल और वज्जि संघ को मगध में मिलाया। उदयन ने पाटलिपुत्र को नई राजधानी बनाया।
- शिशुनाग वंश: शिशुनाग ने मगध के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी अवंती को पराजित किया।
- नंद वंश: महापद्मनंद ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कलिंग को जीता। बाद में, चंद्रगुप्त मौर्य ने घनानंद को हटाकर मौर्य वंश की नींव रखी।
5. उत्तर-पश्चिम में विदेशी आक्रमण
उसी समय, भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमांत पर राजनीतिक अस्थिरता थी। नतीजतन, बाह्य शक्तियों ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किए।
- ईरानी (हखामनी) आक्रमण: ईरानी शासक डेरियस प्रथम ने उत्तर-पश्चिम के कुछ हिस्सों को जीत लिया। यह भारतीय भू-भाग उसके साम्राज्य का 20वां प्रांत (क्षत्रपी) बना। यहां से उसे प्रतिवर्ष 360 टैलेंट सोना राजस्व मिलता था।
- सिकंदर का यूनानी आक्रमण: डेरियस के साम्राज्य को नष्ट करके सिकंदर भारत की सीमा तक पहुंचा। तक्षशिला के शासक आम्भी ने उसके समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।
- पौरस से युद्ध: सिकंदर ने झेलम और चिनाब के बीच राजा पौरस को कड़े संघर्ष के बाद हराया। साथ ही, उसने कठ, मालव और यौधेय जैसे गणराज्यों को भी परास्त किया।
- सेना की वापसी व प्रशासनिक व्यवस्था: व्यास नदी पर सिकंदर की सेना ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। फलस्वरूप, वह वापस लौट गया। उसने विजित क्षेत्रों को पौरस, आम्भी और गवर्नर फिलिप के बीच बांट दिया। 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के बाद सीरिया का क्षेत्र उसके सेनापति सेल्यूकस निकेटर को मिला।
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