1. सभ्यता का परिचय एवं नामकरण
हड़प्पा सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप की प्रथम नगरीय सभ्यता थी। इसके अतिरिक्त, यह प्राचीन विश्व की तीन प्रमुख समकालीन सभ्यताओं (मिस्र, मेसोपोटामिया और हड़प्पा) में से एक थी। क्षेत्रफल तथा विस्तार की दृष्टि से यह सभ्यता मिस्र और मेसोपोटामिया दोनों से कहीं अधिक विशाल थी।
यह सभ्यता वर्ष 1924 तक पूरी तरह प्रकाश में आ चुकी थी। प्रारंभिक दौर में इसके अधिकांश पुरातात्विक स्थल सिंधु घाटी के क्षेत्र में मिले। फलस्वरूप इसे ‘सिंधु घाटी की सभ्यता’ का नाम दिया गया। हालांकि, बाद के उत्खननों में सिंधु क्षेत्र से बाहर भी अनेक स्थल खोजे गए। पुरातत्व की स्थापित परंपरा के अनुसार, सर्वप्रथम खोजे गए स्थल (हड़प्पा, पंजाब) के आधार पर इसका आधिकारिक नाम ‘हड़प्पा सभ्यता’ रखा गया।
2. उद्भव से संबंधित विवाद एवं क्रमिक विकास
हड़प्पा सभ्यता की खोज ने औपनिवेशिक इतिहासकारों की मान्यताओं को चुनौती दी। इसी कारण कुछ ब्रिटिश विद्वानों ने इसके उद्भव को पश्चिमी एशिया तथा मेसोपोटामिया की देन बताने का प्रयास किया।
परंतु यह विचार तार्किक नहीं है, क्योंकि दोनों सभ्यताओं के मध्य स्पष्ट बुनियादी अंतर हैं:
- लिपि एवं मुहरें: हड़प्पाई लिपि और मुहरों की बनावट मेसोपोटामिया से पूरी तरह भिन्न थी।
- नगर योजना: हड़प्पा जैसी व्यवस्थित ग्रिड प्रणाली और उन्नत नालियों का जाल मेसोपोटामिया में नहीं मिलता।
अतः वर्तमान में क्रमिक उद्भव का सिद्धांत ही सर्वमान्य है। इसके अनुसार उत्तर-पश्चिम की स्थानीय ग्रामीण संस्कृतियों (जैसे ईरानी-बलूची, सोथी-सिसवाल, कालीबंगा और कोटदीजी) से ही लगभग 3200 ईसा पूर्व में आरंभिक हड़प्पा चरण विकसित हुआ। आगे चलकर लगभग 2600 ईसा पूर्व में यही पृष्ठभूमि एक पूर्ण विकसित कांस्य युगीन नगरीय सभ्यता में रूपांतरित हो गई।
3. विशिष्ट नगर निर्माण योजना
हड़प्पा सभ्यता अपनी पूर्व-नियोजित नगर निर्माण योजना के लिए पूरे समकालीन विश्व में विलक्षण थी।
- नगरों की बनावट में एकरूपता: नगर सामान्यतः दो स्पष्ट भागों में बंटे होते थे। पश्चिमी भाग में ‘दुर्ग क्षेत्र’ था, जहां शासक वर्ग का निवास था। वहीं पूर्वी भाग में ‘निचला शहर’ था, जहां सामान्य जनता निवास करती थी।
- ग्रिड प्रणाली पर आधारित सड़कें: नगरों का निर्माण शतरंज के बोर्ड (ग्रिड पैटर्न) की तरह किया गया था। पहले सड़कें, गलियां और नालियां बनाई गईं, फिर आवासों का निर्माण हुआ।
- विलक्षण जल निकास प्रणाली: घरों की नालियां गली की नालियों से और गली की नालियां मुख्य सड़क की नालियों से जुड़ती थीं। नालियों की नियमित सफाई के लिए जगह-जगह नरमोखे (Manholes) बनाए गए थे।
- शासक वर्ग का जनहित दृष्टिकोण: मिस्र और मेसोपोटामिया के विपरीत, जहां शासकों की शान-शौकत पर अधिक खर्च होता था, हड़प्पाई शासकों ने सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग जनसामान्य के पक्के मकानों और बुनियादी सुविधाओं पर किया।
- जल संरक्षण प्रणाली: जल की कमी से निपटने के लिए उन्नत जल संरक्षण तकनीक का विकास किया गया। गुजरात का धोलावीरा इसका सबसे प्रमुख एवं उत्कृष्ट उदाहरण है।
आधुनिक नगरों के लिए प्रासंगिकता: हड़प्पाई नगरों से आधुनिक नगर निर्माताओं को पक्की ईंटों के मानकीकरण, सीधी सड़कों और आवासीय व व्यावसायिक क्षेत्रों के पृथक्करण की प्रेरणा मिलती है। हालांकि, वर्तमान शहर उनकी पूर्व-नियोजित जल निकास व्यवस्था और सख्त गवर्नेंस के स्तर को पूरी तरह नहीं अपना पाए हैं।
4. धार्मिक जीवन एवं सामाजिक मान्यताएं
हड़प्पाई धर्म के दो मुख्य पक्ष थे—दार्शनिक चिंतन और आनुष्ठानिक कर्मकांड। भौतिक साक्ष्यों के आधार पर इस काल की प्रमुख धार्मिक विशेषताएं इस प्रकार हैं:
- बहुदेववाद: समाज में एक से अधिक देवी-देवताओं की उपासना प्रचलित थी। इनमें मातृदेवी, पशुपति शिव, प्रकृति, जल, अग्नि, नाग और वृक्ष पूजा मुख्य रूप से शामिल थीं।
- उत्पादक शक्ति की उपासना: कृषि आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण समाज में उर्वरता और उत्पादक शक्ति (मातृदेवी, पृथ्वी, प्रजनन अंग एवं सांड) की पूजा को अत्यधिक महत्व दिया गया।
- मूर्ति पूजा किंतु मंदिर का अभाव: बड़ी संख्या में मिट्टी, धातु और पत्थर की मूर्तियां मिली हैं। यद्यपि मूर्तियों का उपयोग पूज्य प्रतिमा के रूप में होता था, परंतु किसी भी मंदिर संरचना के अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं।
- जीववाद (Animism): बच्चों के कंकालों के साथ ताबीज के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो बुरी आत्माओं से सुरक्षा तथा जीववाद की आस्था की ओर संकेत करते हैं।
5. कलात्मक एवं वैज्ञानिक उपलब्धियां
हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने भौतिक विकास के साथ-साथ कला और विज्ञान में उच्च कोटि की निपुणता हासिल की:
- मुहरें: अधिकांश मुहरें सेलखड़ी (Steatite) से बनाई जाती थीं। ये प्रायः वर्गाकार या आयताकार होती थीं, जिन पर पशुओं की आकृतियां और लिपि उकेरी जाती थी।
- मनका निर्माण उद्योग: आभूषणों के लिए सेलखड़ी, गोमेद, फिरोजा, सोने और चांदी के मनके बनाए जाते थे। गुजरात के लोथल और सिंध के चन्हुदड़ों से मनका बनाने के विशेष कारखाने मिले हैं।
- धातु कला: तांबे में टिन मिलाकर कांसा ढालने की तकनीक का व्यापक विकास हुआ। मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध नर्तकी की कांस्य मूर्ति द्रव्य मोम विधि (Lost-wax Technique) से तैयार की गई थी।
- प्रस्तर एवं मृण्मूर्तियां: मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘दाढ़ी वाले साधु’ की प्रस्तर मूर्ति और हड़प्पा से प्राप्त मूर्तियां शारीरिक संरचना के उच्च ज्ञान को दर्शाती हैं। इसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में टेराकोटा खिलौने और मूर्तियां भी मिली हैं।
- गणित एवं विज्ञान: व्यापार और निर्माण के लिए 16 और उसके गुणकों, दशमलव पद्धति तथा द्विभाजन प्रणाली का प्रयोग होता था। लोथल से हाथीदांत का पैमाना (Scale) मिला है। साथ ही, कालीबंगा से खोपड़ी की शल्य चिकित्सा (Trepanation/Surgery) के साक्ष्य मिले हैं।
6. सभ्यता का पतन एवं सांस्कृतिक निरंतरता
- पतन का वास्तविक स्वरूप: आधुनिक शोधों के अनुसार पतन का अर्थ सभ्यता का विनाश नहीं, बल्कि इसके नगरीय स्वरूप का ग्रामीण संस्कृतियों में बदलना था।
- पतन के उत्तरदायी कारक: पूर्व में दिया गया बाह्य आक्रमण का सिद्धांत अब खारिज हो चुका है। वास्तव में अलग-अलग क्षेत्रों में बाढ़, सूखा, नदियों के मार्ग परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन जैसे बहु-कारक इसके लिए जिम्मेदार थे।
- सांस्कृतिक निरंतरता: नगरों के लुप्त होने के बावजूद हड़प्पाई परंपराएं समाप्त नहीं हुईं। कृषि तकनीक (हल, बैलगाड़ी), धार्मिक प्रथाएं (शिव-मातृदेवी पूजा, पीपल, जल व नाग उपासना) और आभूषण निर्माण के तत्व वर्तमान भारतीय संस्कृति में आज भी निरंतर जीवित हैं।
