History

पाषाण काल से ताम्र पाषाण काल: इतिहास नोट्स एवं संपूर्ण विश्लेषण

September 1, 2026 Sonu 1 min read

प्रागैतिहासिक काल एवं आद्य-ऐतिहासिक काल का वर्गीकरण

इतिहासकारों ने आरंभिक मानव इतिहास को साक्ष्यों और आर्थिक गतिविधियों के आधार पर वर्गीकृत किया है:

  • 1. प्रागैतिहासिक काल (Pre-historic Period) :
    • जिस काल के अध्ययन के लिए केवल पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध हों, साहित्यिक साक्ष्य नहीं।
    • जिस काल में कृषि का आरंभ नहीं हुआ था।
    • वर्गीकरण: पुरापाषाण काल और मध्य पाषाण काल को इसके अंतर्गत रखा जाता है।
  • 2. आद्य-ऐतिहासिक काल (Proto-historic Period) :
    • जिस काल के अध्ययन के लिए साहित्यिक साक्ष्य उपलब्ध तो हैं परंतु उनका उपयोग नहीं हो पा रहा हो (जैसे—हड़प्पा सभ्यता की लिपि का न पढ़ा जा सकना तथा वैदिक साहित्य का अलिखित परंपरा में होना)।
    • जिस काल में कृषि का आरंभ हो चुका हो।
    • वर्गीकरण: नवपाषाण काल, ताम्र पाषाण काल और हड़प्पा सभ्यता इसके अंतर्गत आते हैं।
  • 3. ऐतिहासिक काल (Historical Period) :
    • जिस काल के अध्ययन के लिए पुरातात्विक साक्ष्य, साहित्यिक साक्ष्य एवं विदेशी यात्रियों के विवरण तीनों उपलब्ध हों।

पुरापाषाण काल एवं नवपाषाण काल में मुख्य अंतर

पुरापाषाण काल में मानव शिकारी एवं खाद्य संग्राहक था, जबकि नवपाषाण काल में वह खाद्य उत्पादक बन गया। इन दोनों कालों के बीच संक्रमण की अवस्था के रूप में मध्य पाषाण काल की अवधारणा स्थापित की गई है

1. पुरापाषाण काल (Paleolithic Period)

(लाखों वर्ष पूर्व से लगभग 10,000 ईसा पूर्व)

  • जलवायु : यह काल प्लीस्टोसिन (Pleistocene) युग से संबंधित था, जब वातावरण अत्यधिक शुष्क और ठंडा था।
  • तकनीकी विशेषता : क्रोड उपकरणों की प्रधानता थी। बड़े स्फटिक पत्थरों से चौपर-चौपिंग (काटने वाले औज़ार), हस्तकुठार (Hand Axe) तथा विदरिणी (Cleaver) का निर्माण होता था। आगे चलकर शल्क उपकरणों का प्रयोग बढ़ा।
    जलवायु व तकनीक के आधार पर इसके तीन चरण हैं—निम्न पुरापाषाण काल, मध्य पुरापाषाण काल तथा उच्च पुरापाषाण काल। धीरे-धीरे क्रोड की तुलना में शल्क उपकरणों की प्रधानता बढ़ी।
  • जीविकोपार्जन : मानव शिकारी एवं खाद्य संग्राहक था। शिकार की तुलना में खाद्य संग्रह का महत्व अधिक था क्योंकि कंदमूल व जंगली उत्पादों को अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था।
  • सामाजिक संरचना : मानवशास्त्रियों के अनुसार यह ‘बैंड सोसाइटी’ (लगभग 40-50 लोगों का समूह) का समतामूलक समाज था। कार्यस्थल पर स्वाभाविक नेता बनता था, परंतु कार्य समाप्त होते ही समानता स्थापित हो जाती थी। महिलाएं खाद्य सुरक्षा से जुड़ी थीं, अतः उनकी सामाजिक स्थिति अच्छी रही होगी।
  • सांस्कृतिक दृष्टिकोण : मानव ने परिवेश के साथ साहचर्य स्थापित किया। बेलन घाटी के लोहंदा नाला से हड्डी की बनी मूर्ति मिली है जिसे देवी माना जाता है। भीमबेटका के कुछ चित्र भी उच्च पुरापाषाण काल से संबंधित माने जाते हैं।

2. मध्य पाषाण काल (Mesolithic Period)

(10,000 ईसा पूर्व से 6,000 ईसा पूर्व तक)

  • जलवायु संबंधी कारक : होलोसिन (Holocene) युग के आरंभ से वातावरण गर्म और नम हुआ। छोटे पशुओं की संख्या बढ़ी और कृषि के अनुकूल परिस्थितियां बनने लगीं।
  • तकनीकी परिवर्तन : सूक्ष्म पाषाण उपकरणों (Microliths) का प्रयोग शुरू हुआ। इन्हें लकड़ी व हड्डी से जोड़कर तीर-कमान का विकास किया गया।
  • जीविकोपार्जन में परिवर्तन : तीर-कमान से छोटे-बड़े पशुओं का शिकार और मछली पकड़ना संभव हुआ। खाद्यान्न उपलब्धता से जनसंख्या वृद्धि हुई।
    सराय नाहर राय से चक्की व सिलबट्टे से जंगली अनाज निकालने का साक्ष्य मिलता है। मध्य प्रदेश के आदमगढ़ और राजस्थान के बागोर से पशुपालन के आरंभिक साक्ष्य मिलते हैं। मृद्भांडों के आरंभिक साक्ष्य गुजरात के लंघनाज और यूपी के चोपनी मांडो से प्राप्त होते हैं।
  • सामाजिक संरचना : पहली बार परिवार की अवधारणा बनी क्योंकि वृद्धों को बच्चों की देखभाल के लिए घर पर छोड़ा जाने लगा। शवाधान पद्धति (मृतकों को दफनाना) और मृतकों के साथ उपयोगी वस्तुएं रखने की शुरुआत हुई, जो पुनर्जन्म व परलोक की आस्था दर्शाती है।
  • सांस्कृतिक दृष्टिकोण एवं चित्रकला : भारत में लगभग 150 स्थलों (भीमबेटका, मिर्जापुर का सुहागीघाट, संबलपुर, सुंदरगढ़ आदि) से शैलचित्र मिले हैं। ये चित्र पैट्रोग्लिफ (खुरचकर बनाए गए) और 16 रंगों (मुख्यतः सफेद व लाल) के प्रयोग से बने हैं।

मध्य पाषाण कालीन चित्रकला का सौंदर्य बोध एवं आधुनिक कला से तुलना :

  • सौंदर्य बोध की अभिव्यक्ति : सामूहिक शिकार के चित्रों में मानव को माचिस की तीली के रूप में प्रतीकात्मक दर्शाया गया है, जो हिंसा की पीड़ा और करुणा का संकेत देता है। माता द्वारा शिशु का पालन मूलभूत मानवीय लगाव दर्शाता है। सामूहिक गीत-संगीत जीवन में लय की खोज और दौड़ते पशु गतिशीलता को व्यक्त करते हैं।
  • आधुनिक चित्रकला से तुलना : दोनों में सांकेतिकता व प्रतीकात्मकता समान है। अंतर यह है कि मध्य पाषाण कालीन कला आदिम मनोभावों की सरल अभिव्यक्ति है, जबकि आधुनिक कला जटिल मनोभावों की।

3. नव-पाषाण काल (Neolithic Period)

(6,000 ईसा पूर्व से आरंभ)

मानव के खाद्य संग्राहक से खाद्य उत्पादक बनने की प्रक्रिया को ‘नवपाषाण क्रांति’ कहा जाता है

  • जलवायु एवं तकनीक : होलोसिन जलवायु के बीच पत्थर को घिसकर चिकने व पॉलिशदार उपकरणों का निर्माण शुरू हुआ।
  • जीविकोपार्जन : स्थायी गांव बसे, व्यवस्थित खेती और पशुपालन शुरू हुआ। अनाज संचय के लिए मृद्भांडों और धान्य कोठारों का विकास हुआ।
  • प्रमुख स्थल एवं क्षेत्रीय विस्तार :
    • सबसे आरंभिक स्थल उत्तर-पश्चिम में बलूचिस्तान का मेहरगढ़ माना गया था। (नवीनतम खोजों के अनुसार उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में लहुरादेवा सबसे प्राचीन नवपाषाण स्थल है)
    • यूपी की बेलन घाटी से चावल के साक्ष्य मिले।
    • कश्मीर के बुर्जहोम से गर्तनिवास (Pit Dwelling) के साक्ष्य मिले।
    • दक्षिण भारत की मिट्टी कठोर होने के कारण वहां पत्थर के औजारों से खेती कठिन थी, इसलिए वहां पशुपालन ही अधिक महत्वपूर्ण बना रहा।
  • सामाजिक संरचना : बैंड सोसाइटी की जगह ‘मुखिया तंत्र’ ने ली। आयताकार व गोलाकार मकानों का निर्माण सामाजिक विभाजन का संकेत देता है। सामुदायिक भोज और उपहारों का आदान-प्रदान शुरू हुआ।
  • सांस्कृतिक दृष्टिकोण : उत्पादन से जुड़ी मान्यताओं के तहत पकाई गई मिट्टी की मातृदेवी एवं सांड की मूर्तियों की पूजा आरंभ हुई।

4. ताम्र पाषाण काल (Chalcolithic Period)

(लगभग 3,500 ईसा पूर्व से)

  • धातु का आगमन : भारत में लगभग 3,500 ईसा पूर्व में तांबे का प्रचलन आरंभ हुआ। पत्थर और तांबे के औजार साथ-साथ उपयोग होने के कारण इसे ताम्र पाषाण काल कहा गया।
  • हड़प्पा सभ्यता से संबंध : तकनीकी दृष्टि से ताम्र पाषाण काल कांस्य युग से पहले का है। कालक्रम के अनुसार कुछ ताम्र पाषाण स्थल हड़प्पा से पहले के हैं, कुछ समकालीन हैं और अनेक संस्कृतियां हड़प्पा सभ्यता के बाद की हैं। जब तक लौह युग नहीं आया, तब तक कई क्षेत्रों में ताम्र पाषाणिक व्यवस्था चलती रही।
  • जीविकोपार्जन एवं शिल्प : कृषि अधिशेष बढ़ने से शिल्प, कारीगरी और अन्नागारों का विस्तार हुआ।
  • सामाजिक विभाजन : मुखिया तंत्र और मजबूत हुआ। इनामगांव से प्रमाण मिलता है कि शिल्पियों को पश्चिमी भाग में और मुखिया के मकान को बस्ती के केंद्र में बनाया जाता था।
  • सांस्कृतिक जीवन : देवी और सांड की मूर्तियों के माध्यम से उत्पादक शक्तियों की पूजा जारी रही तथा गुफा चित्रकला का विस्तार हुआ।

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